मध्यप्रदेश में जून से गरीबों को 1 रुपए प्रति किलो गेहूं एवं 2 रुपए प्रति किलो चावल देने की घोषणा की गई है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निर्देश पर राज्य शासन ने योजना के तहत रियायती दरों पर अंत्योदय एवं बी.पी.एल. परिवारों को यह राशन उपलब्ध कराएगा. सरकार के इन निर्णय पर नेता प्रतिपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. श्री सिंह ने कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा 1 रुपए प्रति किलो गेहूं एवं 2 रुपए प्रति किलो चावल देने की घोषणा प्रदेश की गरीब जनता के साथ छलावा है एवं यह उनका मुफ्त में यश लूटने की घटिया शैली है.
मध्यप्रदेश के नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने इन दिनों मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर आरोपों की झड़ी लगा दी है. आज उन्होंने फिर सरकार के खिलाफ आग उगलते हुए कहा कि श्री चौहान ने प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता को छलने, ठगने और गुमराह करने के सिवा कुछ नहीं किया है. उन्होंने कहा कि विकास दर में नंबर वन मध्यप्रदेश को बताने के लिए सरकार ने 50 करोड़ रुपए खर्च कर दिया है. श्री चौहान ने राजनीति में एक घटिया संस्कृति की शुरुआत की है.
गर्मियों की आहट के साथ-साथ सियासी सर्गर्मियां भी तेज हो चली हैं. अगली गर्मियों में आम चुनाव होने हैं, तय है तब तक सियासी पारा चढ़ता ही चलेगा, थमेगा नहीं. खास तौर पर क्षेत्रीय दलों में 2014 की चुनावी तैयारियों को लेकर उतावलापन कुछ ज्यादा ही है. प्रमोद कुमार की रिपोर्ट...
प्रधानमंत्री के लिए एक संभावित उम्मीदवार के रूप में नरेंद्र मोदी के बारे में बात करना बंद तो नहीं कर सकते हैं. मायावती और मुलायम सिंह यादव अभी भी अपनी महत्वाकांक्षाओं को पाले हुए हैं. लेकिन प्रकाश करात और सीताराम येचुरी के बारे में कौन बात कर रहा है? ऐसा लगता है जैसे मुख्यधारा की मीडिया को भी भारतीय राजनीति में किसी भी परिणाम के खिलाड़ी के रूप में वाम मोर्चा की कोई भूमिका ही नजर नहीं आ रही है.
अगामी लोकसभा चुनाव से पहले शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) का विलय हो सकता है. यदि दोनों दलों के प्रमुख उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के बीच सबकुछ ठीक रहा तो शिवसेना और मनसे एक हो जाएगी.
लगभग 45 प्रतिशत आबादी वाले दलित और आदिवासियों पर अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहा. बलात्कार से लेकर सामाजिक बहिष्कार तक के हजारों प्रकरण थानों में दर्ज हुए लेकिन न्याय ना के बराबर ही मिल पाया. कानून और आयोग तो माखौल बनकर रह गये हैं. अनिल द्विवेदी की रिपोर्ट ... ‘दामिनी-प्रकरण’ के बाद जब सारा देश महिलाओं पर हो रहे यौन-अत्याचार और त्वरित-न्याय की बहस में उलझा है तब एक अलग तस्वीर सामने आती है और वह यह कि महिलाओं की इज्जत खाकी वर्दी के साये में भी सुरक्षित नहीं है.
कांग्रेस को 2014 में सफलता मिले इसके लिए न सिर्फ उसे यूपीए दो की गहराती प्रेत छाया से निकलना होगा बल्कि एक नई कांग्रेस का उदय भी आवश्यक होगा, इन सबकी जिम्मेदारी राहुल गांधी के नौजवान कंधों पर है. राहुल के उपाध्यक्ष बनने के बाद पार्टी के लिए उपजी आशंकाओं और आशाओं का आकलन करते प्रमोद कुमार
छह महीने की मुसलसल खामोशी के बाद माहौल और मौका भांपकर मायावती एक बार फिर दम-खम के साथ सूबे के सियासी मैदान में कूद पड़ी हैं, यह उनके प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिशों वाले मिशन -2014 का जोरदार आगाज है, अंजाम वक्त तय करेगा.
उत्तर प्रदेश में पूर्ववर्ती बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सरकार के दौरान हुए लैकफेड घोटाले के आरोपी कई मंत्रियों पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है। पूर्व मंत्री बादशाह सिंह की गिरफ्तारी के बाद अब करीब आधा दर्जन पूर्व मंत्रियों को यह भय सता रहा है कि कहीं पूछताछ के बहाने उन्हें भी गिरफ्तार न कर लिया जाए।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने फिर से डॉ. संजय लाठर को पार्टी के यूथ विंग समाजवादी युवजन सभा का राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोनीत किया है. 11 सितंबर, 2012 को डॉ. संजय लाठर को युवजन सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से हटा दिया गया था. बाद में पार्टी ने जांच में पाया कि को जिन आरोपों के तहत उन्हें पद से हटाया गया था वे सभी बेबुनियाद थे.
चले थे हरि भजन को ओटन लगे कपास! बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की दशा कुछ इसी तरह हो गई है. जंगल राज का खात्मा कर सूबे में सुशासन कायम करने का दावा करने वाले नीतीश कुमार शायद यही सोचकर अधिकार यात्रा पर निकले थे कि लोग उनका जयगान करेंगे, लेकिन वे जहां भी जा रहे हैं उन्हें जनाक्रोश का सामना करना पड़ रहा है.
गठबंधन की राजनीति के इस दौर में कब किसकी किस्मत खुल जाए, कहना मुश्किल है. बदलते राजनीतिक हालात में प्रधानमंत्री की कुर्सी के कई दावेदार हैं. जो प्रबल दावेदार नहीं भी हैं वे भी अपने दांवपेच आजमा सकते हैं. संख्या बल से ज्यादा शर्तों से सहमति बनती है, मसलन एचडी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल का प्रधानमंत्री बनना महज इत्तेफाक ही तो था. आगामी लोकसभा चुनाव का आकलन करना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन कहीं वे भी दौड़ में हो सकते हैं, जो चर्चा में ही नहीं हैं.
लंबे समय तक देश की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों को करीब से देखने वाले जाने-माने पत्रकार रामबहादुर राय बता रहे हैं कि कब कैसी बनती रहीं सरकारें और कैसे चुने जाते रहे प्रधानमंत्री
प्रियंका गांधी में लोग पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का अक्स देखते हैं. कांग्रेस समर्थकों को उनके सक्रिय राजनीति में पदार्पण की प्रतीक्षा है. कुछ लोगों का ऐसा भी मानना है कि उनके आने से कांग्रेस में करिश्मा हो हो सकता है. हालांकि पार्टी नेता इस पर हमेशा चुप्पी साधे रहते हैं
सच तो यह है कि सारे नेताओं में आत्मा और आशा 'कॉम्बो पैक' में ही मिलती है. सियासत में जब तक सांस है तब तक आस है. आडवाणी ने भी आस नहीं छोड़ी है. 'पीएम इन वेटिंग' अनवरत प्रतीक्षारत हैं और अपने सुदीर्घ सियासी जीवन के अभूतपूर्व कालखंड का सामना कर रहे हैं.