अंक -25 / 07 / 2010

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E-Magazine

  द लास्ट पंच

cartoon of the week


  संपादकीय

Professor Arindam Chaudhuri, Renowned Management Guru & Economist, Dean - IIPM

सर्व शिक्षा अभियान में भ्रष्टाचार ने करोड़ों बच्चों के जीवन से आज की शिक्षा को ही नहीं लूटा है, बल्कि उसने हमेशा के लिए सम्मानजनक जीवन जीने के उनके अवसरों को भी लूट लिया है
जिस तरह पिछली बार मैंने यूपीए सरकार की एक ऐतिहासिक विकासात्मक पहल-नरेगा के बारे में लिखा था, इस बार मैंने उसी तरह की, या यूं कहें कि उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण पहल-सर्व शिक्षा अभियान के बारे में लिखने का फैसला किया.ऐसी पहल, जो देश के समूचे सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य को बदल देने का भरोसा दिलाती है, बशर्ते उसकी क्षमता का सटीक इस्तेमाल किया जाए! लेकिन यहां एक बहुत बड़ा सवाल है. अगर पुराने पन्ने उलट कर देखें तो सरकार की हर एक विकासात्मक पहल भ्रष्टाचार से भरी पड़ी नजर आती है. नतीजों की कसौटी पर वे कभी पूरी तरह खरी नहीं उतर पाई हैं. और सर्व शिक्षा अभियान की वास्तविकता भी यही है... आगे>>>


  विशेष कालम
Column news
प्रशांतो बॅनर्जी
अथ श्री कैंटरबरी कथा आगे>>>
Column news
थॉमस फ्रीडमैन
तुर्की का झुकाव अरब लीग की तरफ  आगे>>>



  आमुख कथा
Cover Story

बुरे दिन बाहुबलियों के



सींखचों के पीछे हैं बिहार के सभी सियासी माफिया.
क्या सूबे के विधान सभा चुनावों पर होगा इसका व्यापक असर? आगे>>>

    मंथन                                        

Prasoon S. Majumdar - Editor, Economic Affairs
संभावना बनाम पैमाना!

माइक्रो फाइनेंस हमारी पीढ़ी की सबसे क्रांतिकारी आर्थिक अवधारणा है. इसकी खूबसूरती उसकी सादगी और उसके दूरगामी प्रभाव में निहित है, जो कि गरीबों के जीवन में साफतौर पर नजर भी आती है. मानव मात्र को दिए गए मोहम्मद यूनुस के इस तोहफे की जितनी भी तारीफ की जाए, कम है!!...आगे>>>


  प्रिय संपादक
Dear Editor
जवानों के हित हों सुरक्षित

द संडे इंडियन के जून अंक में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष केजी बालाकृष्णन की वह टिप्पणी पढ़कर बहुत सुखद अनुभव हुआ, जिसमें उन्होंने माओवादियों से जूझ रहे जवानों के जीवन को न केवल मूल्यवान बताया था, बल्कि उनके बारे में विचार करने की बात भी कही थी. इस टिप्पणी से पता लगा कि सुरक्षा बलों के जवानों के पास भी अधिकार होते हैं. अच्छी बात यह है कि मानवाधिकार आयोग को इस बात का अहसास बहुत जल्द हो गया. अगर गौर किया जाए तो पता लग जाएगा कि देश और देशवासियों की रक्षा करते हुए अपना जीवन बलिदान करने वाले जवानों की जान कितनी सस्ती हो चली है. रोज ही देश के किसी न किसी कोने से जवानों के मरने की खबरें आती हैं. सही कहा जाए तो जवानों की शहादत अब रोजमर्रा की घटना बन गई है... आगे>>>