अंक -29 / 11 / 2009

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E-Magazine

  द लास्ट पंच

cartoon of the week


  संपादकीय

Professor Arindam Chaudhuri, Renowned Management Guru & Economist, Dean - IIPM

मनु शर्मा विलंबित और भेदभावपूर्ण न्यायपालिका का अनुपम उदाहरण रहा है!!
मनु शर्मा एक बार फिर चर्चा में है, और हमेशा की तरह गलत वजहों से! मेरे लिए मनु शर्मा एक विशेष मामला है. उसका मामला हमारे देश की न्यायपालिका का अनुपम उदाहरण है जो कि अत्यधिक सुस्त और जाहिरा तौर पर भेदभावपूर्ण है.
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि 2006 में मनु शर्मा को उम्र कैद की सजा सुनाई गई थी एक हत्या के लिए, जिसे उसने 1999 में अंजाम दिया था. हत्या जैसे जघन्य अपराध के लिए उसको दोषी ठहराने में हमारी अदालतों को लगभग दस साल का समय लगा, जबकि उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत थे... आगे>>>


  विशेष कालम
Column news
प्रशांतो बॅनर्जी
विनम्रता में सबक  आगे>>>
Column news
माइकल मेयर
ढहना, बर्लिन की दीवार का  आगे>>>
Column news
शखी देवी
दमन का प्रतीक:आम्र्ड फोर्सेंस स्पेशल पावर एक्ट आगे>>>



  आमुख कथा

Cover Story
पूरा है विश्वास, हम होंगे कामयाब...

विरोध जताने के लिए सैकड़ों मील का सफर तय कर लोग भले ही जंतर-मंतर आ जाते हों, लेकि नवहां से महज चंद कदमों की दूरी पर स्थित लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर यानी संसद तक उनकी आवाज नहीं पहुंच पाती. फोटोग्राफर मुकुंद डे के साथ अनिल पांडेय का खोजपरक विश्लेषण...


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  मंथन

Dear Editor जनसांख्यिकीय आपदा

इसमें कोई शक नहीं कि जहां तक जनांकिकीय का सवाल है भारत अजेय और लाभप्रद स्थिति में है. यहां तक कि चीन जिसकी आबादी संसार में सबसे ज्यादा है, उसकी तुलना में भी भारत खास तौर पर 8 से 24 वर्ष की आयु वर्ग के लोगों के जनसांख्यकीय अनुपात के संबंध में बेहतर स्थिति में है. यह तथ्य इस बात का संकेत है कि, भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से जवान हो रही है और विश्व अर्थव्यवस्था बूढी, जाहिर है यह आपूर्ति और बाजार की मांग के पक्ष को मजबूत बनाता है ... आगे>>>

  प्रिय संपादक

Dear Editor सबकुछ संभव है

अभी तक की सबसे बड़ी खबर 'अमरत्व की ओरÓ पढ़कर सचमुच डर लगने लगा है. जन्म और मृत्यु जीवन का सत्य है, बिना मौत जीवन भी नीरस है. हमेशा के लिए जीवित रहने की वांछनीयता किस दिन जीवन को उबाऊ बना देगी, यह कहना मुश्किल है. जीवन-मरण का सह-अस्तित्व मनुष्य जीवन का यथार्थ है. जहां खुशियां और गम, कष्टï और आराम, हंसना और रोना, पाना और खोना साथ-साथ हैं वहीं जिंदगी चलती है. चलते रहने का नाम ही जीवन है. इसलिए अमरत्व की कल्पना खालिस ख्याली है. वैसे तो आज के वैज्ञानिक युग में कुछ भी असंभव नहीं है... आगे>>>