अंक - 05 / 04 / 2009

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E-Magazine

  द लास्ट पंच

cartoon of the week


  संपादकीय

Professor Arindam Chaudhuri, Renowned Management Guru & Economist, Dean - IIPM

आमिर खान ने हर उस व्यक्ति के खिलाफ वोट न डालने की शपथ ली है, जो भारत विरोधी है. शायद इस बार उनका वोट नहीं डालने का इरादा है!!
अब जबकि आम चुनाव सिर पर है, तब केवल राजनीतिक दल ही नहीं, बल्कि विभिन्न संगठनों ने भी खुद-ब-खुद अपने को चुनाव अभियान में शामिल कर लिया है. अंतर केवल इतना ही है कि राजनीतिक दल जहां खुद को वोट देने के लिए मतदाताओं से प्रेम दिखा रहे हैं वहीं विभिन्न संगठन इस कोशिश में हैं कि मतदाता मतदान केंद्र तक जाएं या फिर वे उन्हें मताधिकार के बारे में जानकारी दे रहे हैं. .... आगे>>>


  विशेष कालम
Column news
प्रशांतो बॅनर्जी
बाबू जी धीरे चलना... आगे>>>
Column news
नॉम चोम्सकी
शुरू हो सकता है वैश्वीकरण का नया दौर  आगे>>>
Column news
मौलाना वहीदुद्दीन खान
सकारात्मक जीवन ही है असली धर्म आगे>>>



  आमुख कथा
Cover Story

भगवान भरोसे


उसे लगा था कि घर लौटकर वह अपने पैरों पर फिर खड़ा हो जाएगा. उसे क्या पता था कि उसके पैरों के नीचे सरकती रेत होगी. 24 वर्षीय अल्पेश गांगुली सिंगापुर की जानी-मानी कंपनी रॉबर्ट वाल्ट्स में काम कर रहा था और खुश था. लेकिन अचानक एक दिन वह वैश्विक मंदी का शिकार हो गया. उसके जैसे सैकड़ों लोगों को एक दिन बड़ी नम्रता के साथ नौकरी से निकाले जाने का फरमान सुना दिया गया. गांगुली ने भारत की उड़ान भरी और तब महसूस किया कि बड़ी क्रूरता के साथ मंदी उसका पीछा जन्मभूमि तक कर रही थी. वह भारत की हवा में सांस तो ले सकता था, लेकिन उसके लिए भारत में कोई नौकरी नहीं थी. तब वह भगवान की ओर मुड़ा, जिससे उसे ढाढस और मुक्ति की आशा थी. ...आगे>>>

    मंथन                                        

Prasoon S. Majumdar - Editor, Economic Affairs
हकीकत आधी दुनिया की

हालांकि इस विषय को केंद्र में रखकर कई अध्ययन और अकादमिक प्रयोग हो चुके हैं कि किस तरह महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की सुविधा देकर पुरुषों से अधिक सफल बनाया जा सकता है. लेकिन इस दिशा में शायद ही ऐसा कुछ किया गया होगा, जिसे ठोस कहा जा सके. ...आगे>>>


  प्रिय संपादक
Dear Editor
वाकई दुखदायी है

22 फरवरी के अंक में प्रधान संपादक की कलम से में "कृप्या स्लमडॉग मिलिनेयर न देखें, यह दुखदायी है', पढ़ा. अरिंदम चौधरी ने सच ही लिखा है. फिल्म में भारत की जो घिनौनी तस्वीर पेश की गई है, वह वाकई दुखद है. इससे पहले भी कई फिल्में भारत में बनी हैं जिनमें गरीबी को मुख्य विषय बनाया गया है, लेकिन कभी गरीबी को घिनौने रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है... आगे>>>