प्रवासी भारतीय महिलाओं में हिंदी लेखन के प्रति रुझान बढ़ रहा है. दुनिया के पचास से भी अधिक देशों में फैले दो करोड़ से अधिक प्रवासी भारतीय चाहे किसी देशी- विदेशी भाषा में काम करें, बात करें, व्यापार करें पर उनका दिल उनकी अपनी भाषा में ही धड़कता है.
उनके हिंदी प्रेम का ही नतीजा है कि इन देशों में रह रही पचासों प्रवासी महिलाएं हिंदी की सेवा और हिंदी में लेखन कर भारत को गौरवान्वित कर रही हैं. प्रवासी भारतीय महिला लेखिकाओं में पहला नाम उषा प्रियवंदा का है जिनका विदेश में पहला कहानी संग्रह- एक कोई दूसरा- किसी प्रवासी हिंदी महिला रचनाकार की पहली रचना बनी. आज ये महिलाएं अपनी लेखनी से हिंदी साहित्य को समृद्ध करने के साथ ही साथ हिंदी के प्रचार प्रसार का भी स्तुत्य प्रयास कर रही हैं. आइये जानें कि कौन हैं हिंदी विश्व की 25 श्रेष्ठ प्रवासी महिला लेखिकाएं:
साहित्यबोध, चिकित्सा में शोध- कमला दत्त
चिकित्सा शास्त्र की प्रोफेसर कमला दत्त अमेरिका के अटलांटा में 1969 से रह रही हैं और तकरीबन तभी से विभिन्न साहित्यिक विधाओं में उनका लेखन निरंतर जारी है. उनकी कहानियां सारिका, धर्मयुग, कहानी और हंस में लगातार प्रकाशित होती रही हैं. इसके साथ ही वह थियेटर से जुड़ी हंै. कमला जी ने 'आषाढ़ का एक दिन' और 'पगला घोड़ा' नाटक, जो कि अटलांटा में मंचित हुआ, में मुख्य भूमिका अदा की. इनकी कृति 'सलीब पर टंगी मछली' प्रकाशित हो चुकी है. एक अन्य रचना 'तुम निहाल दई' प्रकाशन के लिए तैयार है. साहित्य सृजन के साथ ही वह चिकित्सा विज्ञान पर शोध ग्रंथ भी लिख चुकी हैं.
कवयित्री कमाल की - दिव्या माथुर
दिल्ली में जन्मी और वहीं पढी-लिखीं दिव्या माथुर यूके की एक ऐसी रचनाकार हैं जो हिंदी-अंग्रेज़ी दोनों में ही समान अधिकार से लिखती है. दिल्ली एवं ग्लास्गो से पत्रकारिता में डिप्लोमा ले चुकी दिव्या जी को आट्र्स काउंसिल ऑफ इंग्लैंड द्वारा आट्र्स एचीवर एवार्ड, कथा यूके द्वारा पद्मानंद साहित्य सम्मान, यूके हिंदी समिति द्वारा संस्कृति सेवा सम्मान और भारतीय उच्चायोग द्वारा डॉ. हरिवंश राय बच्चन सम्मान मिल चुका है. हाल ही में डॉ कर्ण सिंह ने उनके काव्य संग्रह, 'झूठ, झूठ और झूठ' के लिए उन्हें राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त प्रवासी भारतीय पुरस्कार प्रदान किया. दिव्या विदेश में अपनी हिंदी सेवा से साहित्य का गौरव बढ़ाने का कार्य कर रहीं हैं.
साहित्य और दर्शन दोनों में दिखती समान गति- ऊषा राजे सक्सेना
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर विश्वविद्यालय में पढ़ी ऊषा राजे सक्सेना ब्रिटेन में रह कर हिंदी की पताका ऊंची किए हुए हैं. अभी हाल ही में उनकी सेवाओं के लिए लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग द्वारा उन्हें 'डॉ. हरिवंश राय बच्चन यूके हिंदी साहित्य लेखन पुरस्कार' से सम्मानित किया गया है. 1943 में जन्मी ऊषा राजे बचपन से ही साहित्यानुरागी थीं. हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी भाषा पर उनकी गजब की पकड़ तथा साहित्य, दर्शन के प्रति उनकी अभिरुचि का ही प्रतिफल है उनका प्रभावशाली लेखन. कहानी, कविता, संस्मरण, लेख, यात्रा वृतांत उनकी प्रिय विधाएं हैं. उषा राजे की भाषा और शैली बेहद आकर्षक है. वे तत्संबंधी विधा के साथ तालमेल बिठाती हुई चलती हैं. इसी के कारण उनकी लिखी पुस्तकें बेहद पठनीय और रोचक हैं.
गीतों और गजलों को दी गरिमा, मंच को प्यार- नीना पॉल
नीना पॉल के अंदर छुपा साहित्यकार बचपन से ही नजर आने लगा, जब महज नौ साल की उम्र में उनकी लिखी एक कविता सम्मानित हुई. अंबाला (पंजाब) में जन्मीं नीनाजी कानपुर विश्वविद्यालय से एमए करने के बाद इंग्लैंड चली गईं. साहित्य से अनुराग बना रहा. न्यूजर्सी, कनाडा, न्यूयॉर्क जैसे शहरों में जाकर नीना जी ने काव्य गोष्ठियों में कविता पाठ किया. नीना जी मूलत: कविताएं, गजलें और कहानियां लिखती हैं. नीना की गजलों और कविताओं की समूचे इंग्लैंड में धूम है. इनका सस्वर पाठ श्रोताओं को भावविभोर कर देता है. इनकी आठ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 'अठखेलियां' लघु कथा संग्रह है और 'कसक', 'नयामत', 'अंजुमन' कविताओं और गजलों का संग्रह है. इसे काफी सराहा गया. उपन्यास 'तलाश' के लिए लंदन में इन्हें पद्मानंद साहित्य सम्मान से भी सम्मानित किया गया.
यहां है हिंदी-अंग्रेजी, साथ-साथ- शैल अग्रवाल
शैल अग्रवाल का जन्म 1947 में वाराणसी के एक संभ्रांत व्यापारिक परिवार में हुआ. इन्होंने अपनी पहली कविता आठ वर्ष की उम्र में लिखी थी. पहली कहानी 11 वर्ष की उम्र में लिखी. दोनों ही 'आज' अखबार में प्रकाशित भी हुई थीं. 2003 में मिडलैंड आर्ट काउंसिल ने इनकी अंग्रेजी कविता 'रिफ्यूजी' को रिफ्यूजी चेतना सप्ताह के लिए चुना. वर्तमान में शैल यूके में रहकर हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में निरंतर लिख रही हैं. इनकी प्रकाशित पुस्तकों में 'समिधा'- कविता संग्रह, 'ध्रुवतारा'-कहानी संग्रह और 'लंदन पाती'-निबंध संग्रह है. कविता संग्रह 'नेतिनेति' व उपन्यास 'शेष-अशेष' प्रकाशनाधीन हैं. 'समिधा' के लिए इन्हें लक्ष्मीमल सिंघवी सम्मान मिला है. 2007 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने साहित्य में योगदान के लिए उन्हें उत्कृष्ट साहित्य सृजन सम्मान (विदेश) से सम्मानित किया.
रेडियो और लेखन का अनोखा मेल -अचला शर्मा
बीबीसी हिंदी सेवा की अध्यक्ष रहीं अचला शर्मा का जुड़ाव जितना रेडियो पत्रकारिता से रहा, उतना ही लेखन से भी है. दिल्ली विशविविद्यालय से हिंदी में एमए और 'स्वातंत्रोत्तर हिंदी कहानी में महानगर बोध' विषय पर शोध करने के बाद रेडियो पत्रकारिता से जुड़ कर वॉयस ऑफ अमेरिका तथा बीबीसी को अपनी सेवाएं देने के बाद आज वह पूर्णत: लेखन से संबद्ध हैं. उनके कहानी संग्रह - 'बरदाश्त बाहर', 'सूखा हुआ समुद्र' तथा 'मध्यांतर' एवं रेडियो नाटक 'पासपोर्ट' खासे चर्चित हैं. लंदन स्थित साहित्यिक संस्था कथा यूके द्वारा पद्मानंद साहित्य सम्मान सहित कई दूसरे पुरस्कार भी उनकी झोली में हैं.
सामाजिक सरोकार की कायल -कादंबरी मेहरा
दिल्ली में जन्मीं कादंबरी मेहरा लंबे समय से लंदन में रह रही हैं. उन्होंने अपनी शिक्षा लंदन में ली, फिर भी मातृभाषा हिंदी की सेवा में रत रहीं. उनके कहानी संग्रह 'पथ के फूल', 'रंगों के उस पार' साहित्य के क्षेत्र में लंबे समय तक चर्चा के विषय रहे. सन् 2010 में उन्हें कथा यूके द्वारा पद्मानंद साहित्य समान दिया गया, जबकि इसी वर्ष लखनऊ में अखिल भारतीय वैचारिक क्रांति मंच द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया. उनकी कहानियां गुजरात के एमए हिंदी के पाठ्यक्रम में भी निर्धारित हैं. कादंबरी मेहरा की रचनाओं में देश प्रेम का जज्बा और समाज के प्रति सरोकार साफ झलकता है. भारतेंदु हरिश्चंद्र सम्मान से सम्मानित कादंबरी मेहरा उन चुनिंदा लेखिकाओं में से हैं, जो विदेश में रह कर हिंदी का अलख जगाए हुए हैं.
सुर, साहित्य और दर्शन- पुष्पा भागर्व
पिछले 48 वर्षों से पुष्पा भागर्व लंदन में रह कर भारतीय संस्कृति और साहित्य का प्रतिनिधित्व कर रही हैं. पुष्पा जी का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर में हुआ. एमए की डिग्री लेने के उपरांत पुष्पा जी भारतीय दर्शन, साहित्य, कला और संगीत में सक्रिय रहीं. लंदन आने के बाद लगभग 30 वर्षों तक शिक्षण कार्य से जुड़ी रहीं पुष्पा जी का लेखन जारी रहा. इनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और चौथी शीघ्र प्रकाशन के लिए तैयार है. पुष्पा भार्गव कम लिखती हैं पर बेहद सार्थक लिखती हैं. भले ही वह ब्रिटेन में बसी हों पर उनकी रचनाओं को देख-पढ़ कर ऐसा लगता है कि राष्ट्र और समाज के प्रति उनके में बेहद सम्मान है. 2011 में कला और साहित्य की सेवा के लिए इन्हें कला ज्योति का पैट्रन बना कर लॉर्ड लूम्बा ने पुरस्कार दे कर सम्मानित किया.
न्यू मीडिया की माहिर कविता -डॉ. कविता वाचकनवी
डॉ. कविता वाचकनवी की मातृभाषा भले ही पंजाबी हो, लेकिन उनके लेखन की भाषा हिंदी ने साहित्य जगत को समृद्ध किया है. प्रवास में रहने के बाजूद डॉ. कविता ने लगातार लेखन किया है और वह कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं. हिंदी भाषा और साहित्य में एमए की डिग्री लेने के बाद उन्होंने संस्कृत साहित्य में शास्त्री की उपाधि और हिंदी साहित्य व भाषा में प्रभाकर की उपाधि हासिल की. उन्होंने स्त्री सशक्तीकरण के विविध आयाम (ग्रंथ) और दक्षिण भारत कान्यकुब्ज सभा स्मारिका का संपादन भी किया है. कविता वेब पर भी बेहद सक्रिय हैं. अंतरजाल के जरिए साहित्य संवर्धन एवं साहित्य के प्रसार के कार्य को जिस तरह कविता वाचकनवी अंजाम दे रहीं हैं वैसे कम ही लोग हैं, विशेषत महिलाओं में.
साहित्य भी, संयोजन भी...- डॉ. वंदना मुकेश
डॉ.वंदना मुकेश का जन्म 12 सितंबर 1969 को भोपाल में हुआ था. उन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से स्नातक, पुणे विद्यापीठ से अंग्रेज़ी व हिंदी में प्रथम श्रेणी से स्नातकोत्तर एवं हिंदी में पीएच डी की उपाधि प्राप्त की. इंग्लैंड से क्वालिफाईड टीचर स्टेटस की परीक्षा पास की. उन्होंने छात्र जीवन से हीं काव्य लेखन की शुरुआत कर दी थी. 1987 में साप्ताहिक हिंदुस्तान में पहली कविता 'खामोश जिंदगी' प्रकाशन से अब तक विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और साहित्यिक पुस्तकों, वेब पत्र-पत्रिकाओं में विविध विषयों पर कविताएं, समीक्षाएं, संस्मरण, लेख, एवं शोध-पत्र प्रकाशित हो चुके हैं. यूके क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन 2011, में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिये भारत सरकार द्वारा विशिष्ट सम्मान दिया गया. कवयित्री वंदना मुकेश साहित्यिक आयोजनों का विशेष कौशल रखती हैं. भारत सरकार एवं गीतांजलि बहुभाषीय साहित्यिक संस्था, बर्मिंघम द्वारा आयोजित यूके क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन 2011 की संयोजक सचिव मनोनीत की गई.
पिता के प्रभाव से निखरी प्रतिभा- तोषी अमृता
पंजाब में जन्मी तोषी अमृता ने पंजाब विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए के बाद 'पुरातन इतिहास एवं संस्कृति' विषय पर पीएच डी कर तंजानिया में अध्यापन कार्य शुरू कर दिया. पिता पंडित आशुराम आर्य वेदों के प्रकांड विद्वान थे. उन्होंने वेदों का अनुवाद उर्दू में किया. पिता का प्रभाव तोषी पर भी पड़ा. घर के वातावरण के चलते तोशी की बचपन से ही साहित्य सृजन में रुचि रही. इनकी लिखी कविताएं, निबंध व लेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे. लंदन से प्रकाशित एकमात्र हिंदी पत्रिका 'पुरवाई' में इनकी रचनाएं नियमित प्रकाशित होती रहती हैं. इंग्लैंड में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए इनके सराहनीय प्रयासों को देखते हुए बर्मिंघम में हुए क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन- 2011 में इन्हें सम्मानित किया गया. पिछले तीन दशकों से तोषी जी लंदन में राजकीय सेवा में हैं.
प्रकृति प्रेमी पूर्णिमा... - पूर्णिमा वर्मन
कला, संस्कृति तथा प्रकृति से प्रेम करने वाली पूर्णिमा वर्मन ने जहां संस्कृत साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि ली, वहीं स्वातंत्र्योत्तर संस्कृत साहित्य पर शोध किया तो पत्रकारिता और वेब डिज़ाइनिंग में डिप्लोमा भी लिया. 1955 में पीलीभीत (उत्तर प्रदेश) में जन्मी पूर्णिमा वर्मन संयुक्त अरब अमीरात के शारजाह शहर में रहती हैं और वहीं पर साहित्यसेवारत हैं. लेखन, संपादन और जाल प्रकाशन के अनेक रास्तों से गुजरते हुए फिलहाल साहित्यिक जाल पत्रिकाओं 'अभिव्यक्ति' और 'अनुभूति' के संपादन तथा कला कर्म में व्यस्त हैं. साहित्य अकादमी तथा अक्षरम के संयुक्त अलंकरण 'प्रवासी मीडिया स मान', जयजयवंती द्वारा जयजयवंती सम्मान तथा रायपुर में सृजन गाथा के 'हिंदी गौरव सम्मान' से पूर्णिमा जी को विभूषित किया जा चुका है.
बहुभाषी संपादक सुधा - डॉ. सुधा ओम ढींगरा
सितंबर 1959 में जलंधर में पैदा हुईं सुधा ओम ढींगरा उत्तर अमेरिका के साहित्य संसार में जाना-पहचाना नाम हैं. अमेरिका की सर्वाधिक चर्चित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका 'हिंदी चेतना' की संपादिका सुधा जी की हिंदी, अंग्रेजी, पंजाबी और उर्दू पर अच्छी पकड़ है. उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें काव्य संग्रह- 'धूप से रूठी चांदनी', 'तलाश पहचान की' और 'सफर यादों का', कहानी संग्रह- 'कौन सी ज़मीन' और 'वसूली' तथा उपन्यास-'गंगा बहती रही', खासे लोकप्रिय हुए. उन्हें नॉर्थ कैरोलिना की हैरिटेज सोसाइटी की ओर से सर्वोत्तम कवयित्री 2006 सम्मान और चतुर्थ प्रवासी हिंदी उत्सव 2006 में 'अक्षरम प्रवासी मीडिया सम्मान' से सम्मानित किया गया था. सुधा ओम ढींगरा अमेरिका के महिला रचानाकारों की कुशल संयोजक भी हैं.
शोध और साहित्य में संतुलन- डॉ. इला प्रसाद
डॉ. इला प्रसाद ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से भौतिकी में पीएचडी एवं भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), मुंबई में सी एस आईआर शोधवृत्ति पर शोध परियोजना के अंतर्गत कुछ वर्षों तक शोध कार्य किया. 1960 को जन्मीं इला जी के कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक शोध पत्रिकाओं में शोध पत्र प्रकाशित होते रहे हैं. पेशे से वैज्ञानिक होने के बावजूद इनकी हिंदी साहित्य में बड़ी रुचि रही है. इन्होंने शौकिया तौर पर छात्र जीवन से ही लेखन की शुरुआत कर दी थी. शुरुआती दौर में इला जी की रचनाएं कॉलेज पत्रिकाओं एवं आकाशवाणी तक सीमित रहीं. वैज्ञानिक शोध कार्य के दिनों में लेखन क्षमता भी पल्लवित होती रही. इनकी पहली रचना 'इस कहानी का अंत नहीं' जनसत्ता अखबार में प्रकाशित हुई. उसके बाद से सिलसिला चल पड़ा और पत्र-पत्रिकाओं में लगातार लिखती रहीं.
कथाकुंज की सुरभित पुष्प - पुष्पा सक्सेना
पुष्पा सक्सेना अमेरिका के हिंदी साहित्य क्षितिज पर एक प्रतिष्ठित नाम हैं. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भूगोल में एमए करने के बाद पुष्पा जी ने रांची विश्वविद्यालय से हिंदी में एमए और फिर पीएचडी किया. पुष्पा जी की 24 किताबें प्रकशित हो चुकी हैं. इनमें नौ कहानी संग्रह और पांच उपन्यास ऐसे हैं, जिन्हें पाठकों की भरपूर सराहना मिली. इनकी किताबें रूस के मास्को विश्वविद्यालय में हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल हैं. इनकी लिखी कई कहानियां वाशिंगटन विश्वविद्यालय में भी पढ़ाई जा रही हैं. साहित्य रचना के साथ-साथ पुष्पाजी ने टेलीविजन के धारावाहिकों, टेली फिल्मों, वृतचित्रों और विज्ञापन फिल्मों में भी सक्रिय तौर पर योगदान दिया है. इन्होंने टीवी कार्यक्रमों के लिए लेखन के साथ-साथ प्रस्तोता का काम भी किया है.
विधा वैविध्य की प्रियदर्शिनी- सुदर्शन 'प्रियदर्शनी'
पाकिस्तान में जन्मीं और वर्तमान में ओहियो में रह रहीं सुदर्शन 'प्रियदर्शनी' हिंदी साहित्य की कई विधाओं पर समान पकड़ रखती हैं. उनके तीन उपन्यास, तीन काव्य संग्रह और एक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. भारतीय समाज उनकी रचनाओं में मुखरता के साथ अपनी उपस्थिति दमदार ढंग से दर्ज कराता है. सुदर्शन प्रियदर्शनी ने साहित्य की हर विधा के साथ पूरा न्याय किया है. सुदर्शन जी ने कई साहित्यिक ग्रंथों का संपादन भी किया है. इसके लिए उन्हें कनाडा स्थित हिंदी परिषद ने महादेवी सम्मान से नवाजा है. 16 वर्षों से अध्यापन के क्षेत्र में सक्रिय रहने वाली सुदर्शन जी भारतीय कला और संस्कृति को विश्व फलक पर प्रसार देने के लिए 'फ्रेग्रेंस' नामक पत्रिका का प्रकाशन भी करती हैं. उनकी जड़ें भारत के चंडीगढ़ से जुड़ी हैं, इसलिए वह पंजाबी संस्कृति के काफी करीब हैं.
प्रवासी जीवन की कुशल चितेरी- रेणु राजवंशी गुप्ता
रेणु राजवंशी गुप्ता पिछले 28 वर्षों से अमेरिका में सपरिवार रहती हैं, लेकिन भारत से शुरू हुआ उनका लेखन अभी तक जारी है. 20 अक्टूबर 1957 को राजस्थान के कोटा में जन्मी और उत्तर प्रदेश और राजस्थान से बीए और अंग्रेजी साहित्य में एमए की शिक्षा ग्रहण की. उनके लेखन में भारत और अमेरिका के बीच सांस्कृतिक सेतु के निर्माण की झलक दिखती है. देश-विदेश की साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं प्रमुखता से दिखती हैं. उन्होंने प्रवासी भारतीय की जीवन शैली और उनके अनुभवों को अपने लेखन का विषय बनाया. रेणु राजवंशी की अनुभूतियां अपने भुक्तभोग के यथार्थ तथा प्रवासियों के जीवनयापन का ऐसा सजीव व सरस चित्रिण करती हैं कि उनके लेखन की जीवंता देखते ही बनती है. तकरीबन तीन दशकों से अमेरिका में रहने के बावजूद वे भारतीय संदर्भों, सरोकारों और समाज से कतई कटी नहीं हैं.
भावप्रवण कविता से झांकती जिंदगी-रेखा मैत्रा
रेखा मैत्रा कविताओं के प्रति जनूनी हैं. बनारस में पैदा हुईं रेखा जी की पढ़ाई मध्य प्रदेश में पूरी हुई. फिलहाल वह अमेरिका में रहती हैं. कविताओं के प्रति उनके प्रेम ने विदेश में रहने के बावजूद रचनाधर्मिता में कमी नहीं आने दी. उन्होंने शिकागो में बहुचर्चित साहित्यिक मंडली का गठन किया जिसका नाम था -उन्मेष. उन्मेष के जरिए उन्होंने साहित्यिक गोष्ठियां कर हिंदी को अमेरिका में प्रचारित प्रसारित करने में अहम भूमिका निभाई. 1997 से 2007 के दशक में कविताओं की छह किताबें प्रकाशित हुईं. रेखा जी की कविताएं मानवीय भावनाओं और अंतर्मन की कोमल अभिव्यक्ति हंै, जो नए बिंबों, उपमाओं और प्रतीकों के साथ प्रेम और प्रकृति से बेतरह प्रभावित और वास्तविक जीवन के विभिन्न अनुभवों से दो-चार होती हुई लगती है.ं
तारों की चूनर वाली भावना- डॉ. भावना कुंअर
डॉ.भावना कुंअर का जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुआ था. उनकी पढ़ाई-लिखाई दिल्ली में हुई. उन्होंने हिंदी और संस्कृत में एमए करने के बाद पीएच डी में 'साठोत्तरी हिंदी गजल में विद्रोह के स्वर व उसके विविध आयाम' विषय पर शोध किया. वह पिछले कई वर्षों से युगांडा में अध्यापन कर रही हैं. राष्ट्रीय व अंतराराष्ट्रीय मंचों और पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं नियमित रूप से प्रकाशित होती रहती हैं. उनकी एक पुस्तक 'तारों की चूनर' (हाइकू संग्रह) भी प्रकाशित हुई है. डॉ. भावना कुंअर की बहुत ही कम शब्दों में बात को कह देने की कला ने उनके साहित्य सृजन को बहुत प्रभावी बनाया है. वे बेहद मितभाषी हैं. उनकी संक्षेप में ही गहरी बात कह देने के कौशल ने उन्हें कविता की तरफ मोड़ा और विशेषतौर पर हाइकू की तरफ.
शैलजा की शैली ही अनूठी- शैलजा सक्सेना
चित्रकूट में जन्मीं स्नेह ठकोर की शिक्षा-दीक्षा भारत, इंग्लैंड और कनाडा में हुई. हिंदी में एमए, स्नेह जी ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में दो दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखी हैं. इनकी कुछ पुस्तकें टोरंटो डिस्ट्रिक्ट स्कूल बोर्ड के 'इंटरनेशनल लैंग्वेजेज फॉर कंटीन्यूइंग एजुकेशन' के पाठ्यक्रम में भी शामिल हैं. इन्हें भारत के 'साहित्य भारती सम्मान' और कनाडा के 'द नेशनल लाइब्रेरी ऑफ पोएट्री' द्वारा 'एडिटर्स च्वाइस अवाड्र्स' से चार बार सम्मानित किया जा चुका है. लेखन के साथ-साथ स्नेह जी पेंटिंग और अभिनय में भी सक्रिय रही हैं. इन्हें साहित्य, कला एवं चित्रकला के क्षेत्र में कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले हैं. विषयों, कला विधाओं के वैविध्य ने स्नेह ठकोर के अनुभव फलक को व्यापर बनाया है तो प्रदर्शन को तराशा है. इसकी झलक न सिर्फ इनकी कविताओं में बल्कि इनकी बनाई पेंटिंगों तथा अभिनीत भूमिकाओं में साफ दिखाई देती है.
हिंदी को पुष्पित करतीं पुष्पिता - पुष्पिता अवस्थी
नीदरलैंड में 'हिंदी यूनिवर्स सेंटर' के निदेशक पद पर कार्य करते हुए पुष्पिता अवस्थी हिंदी के सृजनात्मक साहित्य के विश्व स्तर पर प्रचार प्रसार में संलग्न हैं. इससे पूर्व उन्होंने सूरीनाम (दक्षिण अमेरिका) के भारतीय दूतावास में कार्य करते हुए 'सातवांं विश्व हिंदी सम्मेलन' आयोजित किया था. पुष्पिता जी के खाते में- 'शब्द बनकर रहती हैं ॠतुएं', 'अक्षत', 'गोखरू', 'सूरीनाम', 'कथा सूरीनाम', 'कविता सूरीनाम', 'कैरेबियन देशों में हिंदी शिक्षा और सूरीनाम', 'हिंदी परिषद का इतिहास', 'ईश्वराशीष', 'दोस्ती की चाह' (अनुवाद) कृति शामिल है, इसके अतिरिक्त वह हिंदी एवं शब्द-शक्ति त्रैमासिक पत्रिकाओं की संस्थापक संपादक भी हैं. उन्हें राष्ट्रीय हिंदी अकादमी द्वारा अंतरराष्ट्रीय अज्ञेय साहित्य सम्मान (2002), राष्ट्रीय हिंदी सेवा अवार्ड-सूरीनाम (2003), सम्मान से नवाजा जा चुका है.
साहित्य की पूजा- अर्चना!- अर्चना पैन्यूली
गढ़वाल विश्वविद्यालय से जीव विज्ञान में एमएससी कर डेनमार्क में अध्यापिका के रूप में सेवा देने वाली अर्चना पैन्यूली विज्ञान की पृष्ठभूमि से आने के बावजूद एक संवेदनशील रचनाकार हैं. इनके द्वारा डेनिश समाज पर पहला उपन्यास हिंदी में लिखा गया. उपन्यास 'वेयर डू आई बिलांग' का अंग्रेजी अनुवाद भी हुआ है. 1963 में भारत में जन्मी अर्चना जी 1997 से डेनमार्क में रह रही हैं. अर्चना जी को उनके उपन्यास 'परिवर्तन' द्वारा उत्तरांचल क्षेत्र के साहित्य में योगदान देने के लिए सम्मानित भी किया गया. अर्चना जी ने डेनिश की सुप्रसिद्ध लेखिका कारेन ब्लिक्शन की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया है.
नेपाल का सुपरिचित हिंदी चेहरा - संजीता वर्मा 'संयोग'
नेपाल की संजीता वर्मा 'संयोग' का जन्म बिहार में 1966 में हुआ था. पेश से शिक्षिका संजीता जी छात्र जीवन से ही कविता लिखती रहीं हैं. जीवन में घटित महत्वपूर्ण घटनाएं उन्हें झंकझोर देती थीं. वह कविता की शक्ल में उन्हें कागज पर उतार देती हैं, जाती है. बाद के दिनों में उन्होंने अन्य विधाओं, मसलन कहानी और उपन्यास की भी रचना की, जो प्रकाशित भी हुर्इं. वह नेपाल की स्वायत्त साहित्यिक संस्था 'नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठान' में विश्व साहित्य तथा अनुवादकी में सदस्य के रूप में मनोनीत है. पिछले कई वर्षों से यूनेस्को के शिक्षा आयोग के साथ जुड़ कर नेपाल में हिंदी भाषा को स्थापित करने के काम में जुटी हुई हैं संजीता संयोग.
परोपकार से है सरोकार-डॉ इंदिरा आनंद
डॉ. इंदिरा आनंद 1964 में अर्थशास्त्र में पीएचडी करने भारत से बाहर गईं और तबसे उनका निवास भारत के बाहर ही रहा. शादी के बाद इंदिरा जी ने ब्रिटेन में स्थायी रूप से घर बसा लिया. स्टॉक ब्रोकिंग जैसे व्यवसाय में सफलतापूर्व 35 साल तक काम करने के बाद इन्होंने पूरा ध्यान लेखन और समाजसेवा पर केंद्रित किया. लंदन से आयुर्वेद में डिग्री हासिल करने के बाद इन्होंने 2002 में 'सहारा मींस सपोर्ट' परोपकारी संस्था बनाई, जिसका उद्देश्य उन भारतीय संस्थाओं को आर्थिक व नैतिक सहयोग देना है जो विभिन्न प्रकार के अभावग्रस्त बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने में सक्रिय हंै. इनकी अब तक दो पुस्तकें छप चुकी हैं. 2008 में हिंदी कविता संग्रह 'अंतर्मन' और 2009 में अंग्रेजी भाषा में 'लिविंग विद माई अदर वल्र्ड-अ कलेक्शन ऑफ ड्रीम्ज, विजन, प्रीमोनिशंस एंड टेलीपैथिक एक्सपिरिएंसेज' लिखी.