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बुधवार, नवंबर 26, 2014
 
 

गरीबी मुक्त भारत बनाना हो तो, भारतीय राजनेता जाएं चीन

 

अरिंदम चौधरी | नवंबर 11, 2011 16:00
 

 

 

एक दशक पहले जब मैं चीन गया था, तो वहां मैंने जो कुछ देखा, उसका मुझ पर गहरा असर पड़ा. मुझे यह महसूस हुआ कि अगर हम सभी दिल्ली वासी अगले 25 सालों तक लगातार चौबीस घंटे और सातों दिन काम करें, तब भी दिल्ली को बीजिंग में बदल पाना मुश्किल होगा. पिछले महीने जब मैं चीन गया तो मुझे उसके इसी रूप के दोबारा दिखाई देने की उम्मीद थी, पर मैंने देखा कि पिछले 10 सालों में ही वहां 25 सालों के बराबर का अतिरिक्त विकास हुआ है !!! अगर दस साल पहले वहां विशाल सड़कें और कम कारें थीं, तो इस वक्त सड़कें उन अमेरिकी कारों से अटी पड़ी थीं, जिन्हें उसने भारत में लॉन्च करने की जहमत तक नहीं उठाई है.

अगर पिछली बार मैंने ऊंची इमारतें देखी थीं तो इस बार उनकी तादाद दस गुना बढ़ चुकी थी. अगर पिछली बार मुझे बीजिंग ने चकित किया था, तो इस बार मुझे अहसास हुआ कि अगर हम अगले 50 सालों तक चौबीस घंटे और सातों दिन काम करें, तब भी हम गुआंगजाऊ तक नहीं बन पाएंगे. मेरा मानना है कि प्रत्येक भारतीय राजनेता (खासकर भारत के उन कयुनिस्टों को, जिन्होंने साल दर साल बेहद शर्मनाक तरीके से अपने राज्यों को धोखा दिया है) का संसद की प्रवेश प्रक्रिया के तहत चीन की यात्रा पर जाना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए, ताकि उन्हें पता चले कि उन्होंने और उनके पूर्ववर्तियों ने किस कदर देश को धोखा दिया है और थोड़े समय में भी एक देश कहां तक पहुंच सकता है. लोग अब कहते हैं कि चीन की अर्थव्यवस्था ने अमेरिका की अर्थव्यवस्था के बराबर की रफ्तार पकड़ ली है.

हमने अपनी किताबों में 10 साल पहले जिस महान भारतीय स्वप्न का जिक्र किया था, वह स्वपन ही है, और आज मैं लिखता हूं कि चीन ने अमेरिका की अर्थव्यवस्था को काफी पीछे छोड़ दिया है. चीनी उत्पादों का इतना ज्यादा अवमूल्यन कर दिया गया है कि गणना का कोई भी तरीका उसकी विशालकाय अर्थव्यवस्था की असल कीमत नहीं बता सकता ! और, इस बात पर भी विचार कीजिए कि केवल कुछ दशक पहले तक चीन को उसकी राजनीतिक संरचना और विशालकाय आबादी, जिसका बढऩा आज भी बदस्तूर जारी है, की वजह से बेहद संदेह भरी नजरों से देखा जाता था.

लेकिन, आज जब हम चीन को देखते हैं तो हमें अहसास होता है कि एक बड़ा चमत्कार रचते हुए, उसे अपनी विशाल आबादी को क्रय शक्ति और वह जीवनशैली देने में कुछ ही सालों का समय लगा, जिससे कि पश्चिम के भी कई देश वंचित हैं! अपनी विशालकाय अर्थव्यवस्था की रचना के लिए छोटे से छोटे स्तर पर व्यवस्थित योजना बनाते हुए और सबसे बड़ी बात यह की कि अपने विकास मार्ग पर नागरिकों को साथ रखते हुए, चीन ने जो कुछ किया या कर रहा है, वह कई देशों की कल्पना से परे है. आज बीजिंग या शंघाई में रहने वाला आम चीनी कमोबेश न्यूयार्क के रहने वाले आम अमेरिकी या लंदन में रहने वाले आम ब्रितानी जैसे ही जी रहा है! तो आखिर चीन ने ऐसा किया क्या है?

वैसे तो कई चीजें हुईं, पर चीन द्वारा 1970 के दशक के अंत में अपने लौह पर्दे को खोलकर, केंद्रीय नियंत्रण से अर्थव्यवस्था को आजाद किए जाने के बाद भी गरीबों के हितों की रक्षा की उसकी प्रतिबद्धता की वजह से सचमुच यह चमत्कार हो सका. भारत के विपरीत, बेहद सावधानी से किया गया योजनाबद्ध उदारीकरण इस देश के तीव्र विकास में मददगार साबित हुआ और सबसे बड़ी बात यह कि इसकी वजह से 50 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी से बाहर आ गए.

लाखों किसानों को अपने सपनों को पूरा करने का मौका मिला और उन्हें भीषण गरीबी से निजात मिली. पिछले 20 सालों में इस आजादी और बंधन मुक्त जीवन की वजह से निर्माण और सेवा क्षेत्र में बड़ी तेजी से विकास हुआ है! यह चीनी जनता के लिए नई आशाओं के उत्सव की तरह और वहां उद्यमशीलता की स्वतंत्रता की नई शुरुआत जैसा था! इस नई भावना और नए लक्ष्य को निर्माण, शिक्षा और कई दूसरे क्षेत्रों में तीव्र निवेश के जरिए बढिय़ा समर्थन मिला, जिसकी वजह से वैश्विक मंच पर चीन विकास का प्रतीक बन गया और निवेश के लिए सबसे पहली पसंद भी.

 इस आजादी ने कृषि क्षेत्र के विकास में भी मदद की. किसान अपने आर्थिक फैसले खुद ले सकते हैं. इस नीति की वजह से लाखों किसान गरीबी के चक्र से बाहर आ गए! ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू आय दोगुनी हो गई. 1978 में आय का यह आंकड़ा 343.4 आरएमबी (55 डॉलर) से बढ़कर 2003 में सीधे 735.7 आरएमबी (411 डॉलर) तक पहुंच गया. 1990 और 2005 के बीच चीनी अर्थव्यवस्था की प्रति व्यक्ति विकास दर चमत्कारिक रूप से 8.7 फीसदी (सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे ज्यादा) थी ! विश्व बैंक द्वारा एक डॉलर प्रतिदिन की क्रय शक्ति यानी 2,836 आरएमबी प्रति वर्ष (वर्ष 2007 का अनुमान) के हिसाब से गरीबी रेखा निर्धारित की गई है!

इस आकलन के मुताबिक 1981 में चीन की 64 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे थी. यह आंकड़ा अविश्वसनीय तरीके से गिरकर 2004 में महज 10 फीसदी (क्रय शक्ति के पैमाने के मुताबिक भारत की 40 फीसदी आबादी अब भी गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करती है)  रह गया. गरीबी उन्मूलन के लिए चीन द्वारा किया गया यह प्रदर्शन, जिसे अक्सर चमत्कार के रूप में उद्धृत किया जाता है, अनुकरणीय और उल्लेखनीय है. साथ ही दुनिया भर के विकासशील देशों के लिए अध्ययन और प्रेरणा का स्रोत भी.

तीन दशक पहले अधिकारियों ने गरीबी उन्मूलन के लिए जो कार्यक्रम शुरू किए थे, आज उनका असर दिख रहा है. उन्होंने आधुनिक चीन की रूपरेखा खींची और चीन आज विश्वास के साथ चमक रहा है. आज हर चीनी किसी भी शहर में जाने और वहां अपनी आजीविका तलाशने के लिए आजाद है (बेशक शहरों में निवास परमिट की भी व्यवस्था है और परमिटधारकों को स्वास्थ्य सुविधाओं में सब्सिडी वगैरह मिल जाती है). फिर भी, किसी को शहरों में सही मायने में एक भी गरीब नहीं दिखेगा. न कोई भिखारी, न कोई मलिन बस्ती और न ही सड़कों पर सोते लोग. अगर सच में गरीबी है और गरीबों को कहीं भी जाकर बसने की आजादी है तो शहरों में झुग्गी झोपडिय़ां होनी चाहिए थीं. चीन में लोग शहरों में बेहतर जिंदगी के लिए आते हैं, न कि इसलिए क्योंकि वे गांवों में मर रहे थे.

चीन में गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम 592 प्रांतों और तिब्बत के 74 से ज्यादा प्रांतों में चलाया गया. जहां तक समृद्धि के वितरण की बात है तो केंद्रीय और पश्चिमी प्रांत हमेशा सबसे कमजोर लिंक रहे थे. ऐसी आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए अधिकारियों ने 1986 से गरीबों को रियायती दर पर कर्ज देना शुरू किया. कर्ज की यह राशि 1986 के 1.05 अरब आरएमबी यानी रेनमिनबी (चीनी मुद्रा) से बढ़ाकर 1996 में 5.5 अरब आरएमबी कर दी गई. उसी तरह भोजन के बदले अनाज कार्यक्रम चीनी सरकार का एक और महत्वाकांक्षी कार्यक्रम था, जिस पर सरकार ने 1986 से 1997 के बीच 33.6 अरब आरएमबी की भारी-भरकम रकम खर्च की. विश्व के दूसरे हिस्सों के उलट जहां इस तरह के कार्यक्रमों की चर्चा, उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार की वजह से होती है, चीनी लोग सड़कें, पुल, बांध और दूसरे आधारभूत ढांचे खड़े करने जैसे उत्पादक कार्यों को देश भर में सफलतापूर्वक अंजाम दे रहे थे.

किसानों को राहत पहुंचाने के लिए कृषि कर और दूसरे करों में रियायत दी गई. 2000 में सारे शुल्क समाप्त कर दिए गए और उनकी जगह एकमात्र कृषि कर व्यवस्था शुरू की गई. बाद में डब्ल्यूटीओ यानी विश्व व्यापार संगठन के हंगामे की आशंकाओं के बीच मार्च 2004 में केंद्रीय सरकार ने अगले पांच सालों में कृषि पर कर को पूरी तरह से खत्म करने का फैसला किया. उसी साल अन्य कृषि सब्सिडी की शुरुआत भी हुई, जिसके बाद ग्रामीण क्षेत्र के आधारभूत ढांचे पर व्यय बढ़ाकर 25 अरब डॉलर कर दिया गया.

अंतत: परिवहन का आधारभूत ढांचा सुधारने को प्राथमिकता दी गई. 1988 में एक्सप्रेस-वे जहां 147 किलोमीटर लंबा था, वहीं 2002 में बढ़कर 25,130 किलोमीटर हो गया. वास्तव में यह उतना आसान नहीं था, जितना सुनने में लगता है. शुरुआत में गरीबी उन्मूलन असमान था और यह बात शहरी और ग्रामीण आबादी तथा एक क्षेत्र व दूसरे क्षेत्र के बीच की गहरी असमानता से साफ जाहिर भी होती थी.

तटीय नगरों में विदेशी फंड और एसईजेड यानी विशेष आर्थिक क्षेत्र, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच की असमानता के लिए जिम्मेदार थे. इसकी वजह से दूसरे क्षेत्र धन की कमी झेलते-झलते कमजोर हो गए. लोगों में निपुणता की कमी, आधारभूत ढांचे की खराब हालत और जर्जर परिवहन व्यवस्था ने मुसीबतों को और बढ़ा दिया. यहां तक कि शहरी इलाकों में भी लोगों की आय और जीवनशैली में बहुत ज्यादा फर्क था. उदारीकरण के बाद ग्रामीण उद्योगों की शुरुआत हुई थी, लेकिन ये मुख्य रूप से पूर्वी क्षेत्रों तक ही सीमित थे.

इसलिए अलग-अलग क्षेत्रों के बीच आय का अंतर बढऩे लगा. ग्रामीण चीन की दुर्दशा को समझकर सरकार ने तीन-कृषि नीति की शुरुआत की, ताकि कृषि उत्पादन बढ़े और किसान समृद्ध हों. ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश बढ़ाकर, कृषि में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाकर, साफ-सुथरा और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देकर और किसानों की आर्थिक मदद बढ़ाकर इस रणनीति पर अमल किया गया. इस बात को मानने के बहुत से कारण हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना ने इसे गंभीरता से लिया.

 2001 में चीन के प्रधानमंत्री झू रोंग्जी ने नेशनल पीपुल्स कांग्रेस में पेश अपनी कार्रवाई रिपोर्ट में कहा कि कृषि क्षेत्र की दशा सुधारना उनकी पहली प्राथमिकता होगी. नए नीतिगत सुधारों को लागू करने के साथ ही 2004 में कृषि सुधारों की नीति पुनर्जीवित हुई. जैसा कि मैंने पहले बताया है, 2005 में आखिरकार कृषि क्षेत्र से सभी कर खत्म कर दिए गए. ग्रामीण क्षेत्र में आधारभूत संरचना को दुरुस्त करने, पीने का साफ पानी मुहैया कराने, स्वच्छ ऊर्जा और संचार को सुगम बनाने के काम में सड़कों के निर्माण की वजह से तेजी आई. जब इन सारी चीजों में गति आ गई, तो ग्रामीण क्षेत्र की आय में आश्चर्यजनक रूप से सुधार हुआ और लोगों की क्रय शक्ति बढ़ी. सामाजिक क्षेत्र जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, ग्रामीण पलायन में कमी और सामाजिक-आर्थिक वातावरण में आश्चर्यजनक ढंग से सुधार हुआ.                  

सबसे अहम बात यह कि, चीन ने गरीबी उन्मूलन का खास कार्यक्रम कुछ इस तरीके से तैयार किया था कि एक बार गरीबी से उबरने के बाद, लोग भविष्य में फिर से गरीबी के दलदल में नहीं गिर सकते थे, जो कि भारत जैसे ज्यादातर देशों के साथ अक्सर होता है. चीन में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के साथ, लगातार बढ़ता रोजगार और सतत प्रगति कर रहा विनिर्माण क्षेत्र यह सुनिश्चित करता है कि लोग क्रय शक्ति समता का स्तर बनाए रखने के लिए आत्मनिर्भर रहें. इस तरह, चीन न केवल गरीबी उन्मूलन  में कामयाब रहा, बल्कि उसने यह भी सुनिश्चित किया कि वह उसके साथ-साथ सतत सुधार कार्यक्रम भी चलता रहे.

इतना ही नहीं, चीन की तेज प्रगति ने गरीबी उन्मूलन के मामले में दुनिया के बाकी देशों को पीछे छोड़ दिया. वह न सिर्फ कृषि के क्षेत्र में शानदार प्रदर्शन कर रहा है, बल्कि ऐसा ही शानदार प्रदर्शन विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में भी देखने को मिला. 1980 से 2002 के बीच, विनिर्माण क्षेत्र ने 11.3 फीसदी वार्षिक वृद्धि दर के साथ सबसे ज्यादा वृद्धि दर्ज की, 10.4 फीसदी वृद्धि दर के साथ सेवा क्षेत्र इसके ठीक पीछे रहा. हालांकि, 2003 से 2008 के बीच कृषि क्षेत्र ने जबरदस्त तरीके से 18.4 फीसदी वृद्धि दर्ज की. कुल सकल घरेलू उत्पाद में क्षेत्र के आधार पर औसतन उद्योग का शेयर 46.8 फीसदी, सेवा क्षेत्र का शेयर 43.9 फीसदी और कृषि का शेयर 9.6 फीसदी रहा.

चीन ने 1978 से शुरू हुए उदारीकरण के दौर के बाद से विनिर्माण क्षेत्र में पलटकर नहीं देखा. 1994 तक, चीन में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, सकल घरेलू उत्पाद के छह फीसदी के स्तर तक पहुंच गया. देश में आ रहीं विदेशी कंपनियां अपने साथ नई तकनीकें, तकनीकी ज्ञान और आधुनिक प्रबंधन के तौर-तरीके लेकर आईं. इस दौरान, तैयार माल का चीनी निर्यात आसमान छूने लगा और 2004 तक विनिर्मित माल का शेयर निर्यात के 90 फीसदी के स्तर को पार कर गया.

ऐसा औद्योगिकीकरण की तेज रफ्तार की वजह से हुआ-और जैसा कि ऐसी स्थितियों में बेहद महत्वपूर्ण होता है-औद्योगिकीकरण को वित्तीय बाजार उदारीकरण का भी साथ मिला. उच्च घरेलू बचत की वजह से आधारभूत संरचनाओं पर जबरदस्त पैसा बहाया गया और विवेकपूर्ण श्रम सुधारों के जरिए मजदूरों के बड़े वर्ग का इस्तेमाल बेहतर ढंग से किया जा सका.

1980 के दशक से 1990 के दशक तक मूल्य निर्धारण प्रणाली और बाजार संस्थाओं को मजबूत करने के लिए सुधार किए गए, साथ ही साथ, संसाधनों के आवंटन पर सरकार के अधिकार को भी ढीला किया गया. इसके बाद, बैंकिंग क्षेत्र में सुधार किए गए और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों पर किए गए सुधार के परिणामस्वरूप सरकार के स्वामित्व वाले ज्यादातर कारखाने बंद कर दिए गए. अर्थव्यवस्था पर सरकार का बढ़ता विनियंत्रण ही बढ़ रहे निजी पूंजी प्रवाह और सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों के तुलनात्मक गिरावट की वजह बना. सकल औद्योगिक उत्पाद मूल्य में राज्य के स्वामित्व वाली इकाइयों की हिस्सेदारी महज 28.2 फीसदी थी, जिसमें पिछले दो दशक में 49.4 फीसदी की गिरावट आई. 1999 में खत्म हुए दो दशकों के दौरान, औद्योगिक उत्पाद मूल्य में निजी पूंजी 56.3 फीसदी के आंकड़े से ऊपर उठ गई.

दो दशकों में संचयी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 400 बिलियन डॉलर है, जो कि चौंकाने वाला आंकड़ा है. इस तरह से विनिर्माण क्षेत्र के विकास ने लाखों लोगों को रोजगार मुहैया कराते हुए तेजी से गरीबी को घटाया है, जिसका उसकी जनता की उच्च क्रय शक्ति पर व्यापक प्रभाव पड़ा. विनिर्माण क्षेत्र के विकास की शुरुआत विशेष आर्थिक क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने से शुरू हुई-और जैसे ही विदेशी पूंजी का अप्रत्याशित प्रवाह शुरू हुआ-चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को विशेष आर्थिक क्षेत्रों से कहीं आगे जाकर देश का कोना-कोना खोल दिया.

इन सबने एक साथ, चीन में निवेशकों का मनोबल बढ़ाया, जिसने देश को विनिर्माण के एक विशालकाय बाजार में तब्दील कर दिया, क्योंकि दुनिया भर के एक से बढ़कर एक बड़े ब्रांड अपने उत्पाद को चीन के जरिए आउटसोर्स करने लगे. विनिर्माण उत्पादन में विभिन्न प्रकार के निवेश को आकर्षिक करते हुए देश के तटवर्ती इलाके खूबसूरत ताज में किसीनगीने जैसे हैं. यहां यह बताना जरूरी है कि इसमें से 90 फीसदी निवेश निजी क्षेत्र का होता है, जो कि लोकप्रिय धारणा के एकदम विपरीत है.

चीन में तृतीयक क्षेत्र-जो कि अक्सर विनिर्माण क्षेत्र की ख्याति की वजह से दबा-दबा-सा रह जाता है-भी उदारीकरण के दौर में तेजी से विकसित हुआ-20 फीसदी के स्तर से शुरू होकर यह क्षेत्र आज जीडीपी के 40 फीसदी के स्तर तक पहुंच चुका है. यह तथ्य अचंभित करने वाला है, लेकिन यह सच है कि 1990 के मध्य के बाद से चीन के तृतीयक क्षेत्र ने अकेले विनिर्माण या कृषि क्षेत्र से ज्यादा लोगों को रोजगार दिया... 2007 के अंत तक इसके द्वारा रोजगार प्राप्त लोगों की संख्या 250 मिलियन थी. यह संख्या कुल रोजगार सूची की 32.4 फीसदी है और 1978 से अब तक इसमें 20 फीसदी की ही बढ़ोतरी हुई है. सेवा क्षेत्र के दो सबसे बड़े घटक थोक व खुदरा (सकल घरेलू उत्पाद का 7.4 फीसदी) और परिवहन, भंडारण व डाक (सकल घरेलू उत्पाद का 5.9 फीसदी) हैं.

इन क्षेत्रों का विनिर्माण उद्योगों से सीधा संबंध है और चीनी निर्यात की दौड़ में ये अगुवा बने हुए हैं. 2001 में विश्व व्यापार संगठन से जुडऩे के बाद, चीन दावा करता है कि वह नौ सेवा क्षेत्रों और 84 उप क्षेत्रों में उदार बन चुका है, जिसमें निर्माण, शिक्षा, पर्यावरण और कई ऐसे ही क्षेत्र शामिल हैं. विश्व व्यापार संगठन द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, 2006 में चीन का सेवा निर्यात पिछले साल की तुलना में 23.7 फीसदी बढ़ोतरी के साथ 91.5 फीसदी पहुंच गया था. इसके साथ ही वह दुनिया का आठवां सबसे बड़ा निर्यातक बन गया.

हम सभी निर्यात के मामले में चीन के प्रभुत्व से वाकिफ हैं, लेकिन ज्यादा आश्चर्यजनक यह है कि चीन का आयात, उसके द्वारा 2006 में किए गए निर्यात से भी कहीं ज्यादा है. आयात पिछले साल की तुलना में 20.3 फीसदी की वृद्धि के साथ 100.3 बिलियन डॉलर पहुंच चुका है, और इस मामले में देश का दुनिया भर में सातवां स्थान है. विश्व व्यापार संगठन से जुडऩे के बाद, सेवा क्षेत्र में विदेशी निवेश जरूरत से ज्यादा आसानी से बढऩे लगा.

2006 में कुल प्रोजेक्टों की संख्या 15,024 थी. इसमें पिछले साल के मुकाबले 7.04 फीसदी की वृद्धि हुई और कुल 19.5 बिलियन डॉलर का पूंजी निवेश हुआ. 2007 में, आउटसोर्स की गई सेवाओं की कीमत 465 बिलियन डॉलर थी-जिसमें 90 मिलियन डॉलर की सूचना प्रौद्योगिकी, 170 बिलियन डॉलर के व्यापार संसाधन, 85 बिलियन डॉलर की सूचना प्रौद्योगिकी अवसंरचना और 120 बिलियन डॉलर के डिजाइन और शोध सम्मिलित थे...जाहिर है, इनसे अभूतपूर्व रोजगार सृजन हुआ.
 
वास्तव में चीन की योजना बहुत व्यवस्थित, वैज्ञानिक और सावधानीपूर्वक बनाई गई है. कोई भी देश इसकी बराबरी करने की सोच भी नहीं सकता है. कुछ मामलों में चीन के साथ भारत की तुलना सिर्फ मूर्खता है. आबादी को छोड़कर, वहां की तुलना के लायक यहां कुछ भी नहीं है. चीन में निवेश की दर भारत की 20 से 26 फीसदी की तुलना में पिछले ढाई दशक से 35 से 45 फीसदी के बीच बनी हुई है. याद  रखें, चीनी निवेश का मतलब है वास्तविक निवेश, हमारे जैसा नहीं, जहां निवेश का ज्यादातर हिस्सा निरंकुश भ्रष्टाचार और अक्षमता की भेंट चढ़ जाता है!

हालांकि, दोनों का इंक्रीमेंटल-कैपिटल-आउटपुट रेशियो बराबर ही है-बुनियादी ढांचे पर उनके निवेश की तुलना हमसे नहीं की जा सकती-चीन के 19 फीसदी की तुलना में भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का औसतन मात्र दो फीसदी निवेश करता है! कोई आश्चर्य नहीं कि चीन में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की भरमार है (दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्राप्तकर्ता) जो बुनियादी ढांचे के निवेश को बढ़ावा देने के साथ व्यापक पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए पर्याप्त राजस्व प्रदान करता है .

इस प्रकार वह एक ऐसे भाग्य चक्र का निर्माण करता है, जिसकी नकल भारत नहीं कर सकता. चीन का विकास पैटर्न भी भारत से अलग है! चीन ने प्राथमिक क्षेत्र के विकास के साथ शुरुआत की और पिछले 25 सालों से वह माध्यमिक क्षेत्र की तरफ मुड़ा है और उसने देश को सही मायने में दुनिया की कार्यशाला बना दिया है. विनिर्माण क्षेत्र में उसकी भारी सफलता ने रोजगार को दो गुना और पिछले दो दशकों  उत्पादन तीन गुना कर लिया है.

वहीं भारत विनिर्माण क्षेत्र में किंचित विकास के साथ प्राथमिक क्षेत्र से सीधे तृतीयक क्षेत्र में कूद पड़ा! बावजूद इसके कि राष्ट्रीय आय में प्राथमिक क्षेत्र की हिस्सेदारी, जो 1950 के दशक में 60 फीसदी से 2003 में 25 फीसदी तक आ चुकी थी, इस क्षेत्र में अब भी 60 फीसदी भारतीय कर्मचारी कार्यरत हैं, इसमें ज्यादातर मजदूरों के लिए रोजगार उत्पादकता काफी घट गई.

व्यापार नीति और व्यापार पैटर्न भी अलग हैं. विशाल स्तर पर निर्यात के चलते पुनरावंटित पूंजी को देश में प्रवेश मिला और ऐसा सस्ते श्रम, विश्वस्तरीय बुनियादी सुविधाओं, उत्कृष्ट परिवहन सुविधाओं और सस्ते आवास की वजह से संभव हो सका, जिसकी वजह से श्रम लागत बेहद कम हो गई. दूसरी तरफ, भारत के सार्वजनिक प्रावधान साधारण हैं, जो निर्यात उन्मुख उद्योगों को मजबूती नहीं दे सकते.

फलस्वरूप उसे निर्यात, निवेश और विकास के लाभ बहुत निचले स्तर के मिले. नतीजतन, भारत मे गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम चीन की तुलना में बहुत कम सफलता पा सका-जबकि गरीबी व्यापक स्तर पर बढ़ती रही और आज देश की 41.6 फीसदी जनसंख्या अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा यानी 1.25 अमेरिकी डॉलर प्रति दिन से नीचे गुजर कर रही है. भारत की गरीबी रेखा का अपना मानदंड है, जो योजना आयोग द्वारा ग्रामीण आबादी के लिए 26 रुपए प्रतिदिन प्रति व्यक्ति और शहरी क्षेत्र के लिए 32 रुपए प्रतिदिन प्रति व्यक्ति अनुशंसित हैं, वह हास्यास्पद है. इसकी तुलना में, चीन की अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा से नीचे की आबादी का अनुपात (इस पर चर्चा पहले हो चुकी है) मात्र 10 फीसदी है!

भारत 1960 के आसपास तक चीन से बेहतर स्थिति में था! महज 50 सालों में चीन बड़े पैमाने पर असली महाशक्ति बन गया, जो अमेरिकियों को भी नीचा दिखाने की ताकत रखता है, जबकि हम दिखावे की दुनिया में जीते हैं और हमें पता तक नहीं है कि महाशक्ति होने का मतलब क्या है. यहां तक कि हम यह भी नहीं जानते कि चीन कहां तक पहुंच गया है. अगर हम भारत को बदलना चाहते हैं तो हमें हर भारतीय राजनेता-सोनिया गांधी से राहुल गांधी, लालकृष्ण आडवाणी से ममता बनर्जी और प्रकाश करात तक को चीन ले जाने की जरूरत है.

क्योंकि जब वे गरीबी उन्मूलन की बात करते हैं, तब मुझे यह मजाक लगता है, वे दूर-दूर तक यह नहीं जानते कि गरीबी उन्मूलन का अर्थ क्या है और इसे कितनी जल्दी दूर किया जा सकता है. वे किस तरह से देश को धोखा दे रहे हैं. उन्हें गुवांगजाऊ जैसे शहर में ले जाकर वहां शहर की घुमावदार सड़कों पर छोड़ दिया जाना चाहिए, जिससे वे तीन घंटे के सफर में किसी सड़क को दोहराए बिना, दुनिया को मात देने वाले बुनियादी ढांचे को देख सकें और अपने कर्मों पर बौना महसूस कर सकें (बेंगलुरु, जिसे हम अपना गौरव मानते हैं उसका खात्मा गुवांगजाऊ का बेहद बाहरी इलाका तक कर सकता है).

उन्हें चीन के वार्षिक कैंटोन फेयर में भी जरूर ले जाना चाहिए (जहां मैं गया था) जिससे उन्हें इतना तो पता चले कि विदेशी खरीदारों को कैसे आकर्षित किया जाता है. उनकी सुविधाओं के सामने हमारी दिल्ली का प्रगति मैदान (जो प्रागैतिहासिक काल का एक गंदा अवशेष लगता है) कहां ठहरता है.

उन्हें शंघाई में बुंड स्ट्रीट के सामने खड़ा कर दिया जाना चाहिए और बताना चाहिए कि वहां सड़क के इस तरफ जेनेवा से दस गुना बेहतर प्रतिकृति और नदी के दूसरी ओर आसमान से देखने पर न्यूयॉर्क से बेहतर शहर नजर आता है और यह सब महज बीस सालों के अंतराल की बात है. और यही वजह है कि वहां चीन में कोई विद्रोह नहीं होता जैसा कि पूंजीवादी सपना देखते रहते हैं-जबकि उनके लोग आज वॉल स्ट्रीट पर कब्जा करने की मांग कर रहे हैं. क्योंकि चीन में आजादी का अभाव है.

यह कहना उसी तरह है, जैसे आप दुबई में खुले आम कुरान के बारे में कोई नकारात्मक बात कहें. ठीक इसी तरह चीन में आप प्रधानमंत्री के बारे में खुले आम नकारात्मक बात नहीं कह सकते (वास्तव में आप यह भी कर सकते हैं. बस, हाईकमान के खिलाफ आंदोलन छेडऩे कोशिश न करें), लेकिन आप सरकार में भ्रष्टाचार के बावत अखबारों में लिख सकते हैं, आप उनकी नीतियों की आलोचना कर सकते हैं, आप गांवों से शहरों की तरफ पलायन कर सकते हैं, आप विदेश जा सकते हैं, आप भी गुची खरीद सकते हैं और मर्सिडीज ड्राइव कर सकते हैं!

चीन में कोई विद्रोह नहीं है, क्योंकि चीन का हर नागरिक किसी न किसी राजनीतिक दल के प्रति प्रतिबद्ध है, वे अपने भाइयों-बहनों की स्थिति दिन-ब-दिन बेहतर होते देख रहे हैं और जब वे शहरों में आते हैं तो देखते हैं कि कैसे उनके शहर पश्चिमी दुनिया के न्यूयॉर्क और लंदन से बड़े और आधुनिक शहरों में तब्दील होते जा रहे हैं. शर्म की बात है कि भारत में हम यह दावा नहीं कर सकते. राष्ट्र के साथ कितना बड़ा विश्वाससघात.
 

 
(Disclaimer: The views expressed in the blog are that of the author and does not necessarily reflect the editorial policy of The Sunday Indian)
 
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अंक तिथि: अगस्त 1, 2013

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