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सोमवार, नवंबर 24, 2014
 
 

आतंकवाद

अफजल की फांसी में न करें और विलंब

 

अलगाववादियों का करीबी बुद्धिजीवी तबका, उड़ा रहा राष्ट्रवादी ताकतों के खिलाफ अफवाह
प्रो. राकेश सिन्हा | Issue Dated: अक्टूबर 16, 2011
 

भारतीय संसद पर 13 दिसंबर, 2001 को हुए हमले की साजिश के मुख्य अभियुक्त अफजल गुरु को सजा-ए-मौत सुनाई जा चुकी है. निचली अदालत, हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट-तीनों की यही राय थी कि यह घटना दुलर्भतम श्रेणी में आती है, लिहाजा इसमें सजा-ए-मौत ही मिलनी चाहिए.
 

यह घटना महज आतंकी कार्रवाई नहीं, बल्कि किसी बड़े षडयंत्र का हिस्सा थी. अगर जांबाज सुरक्षाकर्मी नहीं होते, तो आतंकी अपने मकसद में कामयाब हो गए होते. तब न केवल हताहतों की संख्या में इजाफा होता, बल्कि इसके राजनीतिक परिणाम भी ऐसे होते, जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की होगी. यही वजह थी कि सुप्रीमकोर्ट ने अपने फैसले में कड़े शब्दों में कहा, 'उस घटना ने, जिसकी वजह से इतने लोगों की मौत हुई, पूरे देश को हिलाकर रख दिया था.

समाज की सामूहिक अंतरात्मा तभी संतुष्ट होगी, जब इसके लिए दोषी अपराधी को मौत की सजा सुनाई जाएगी', लेकिन अफजल फांसी के फंदे से अभी तक बचा हुआ है. उसको सूली पर चढ़ाए जाने में हो रही देरी भारतीय राजनीति और समाज के कई गंभीर पहलुओं की बखिया उधेड़ती है.

अफजल गुरु की रक्षा के लिए भारत का बुद्धिजीवी तबका बड़ा ही सुगठित अभियान चला रहा है. वे उसे जेहादी करार दे सकते हैं. वे अलगाववादियों और उनके समर्थकों के दिल के ज्यादा करीब हैं. राष्ट्रवादी ताकतों के खिलाफ वे झूठी अफवाहों को हवा दे रहे हैं. इसीलिए दूसरे देशों से नैतिक और वित्तीय समर्थन हासिल करने में उन्हें फख्र का अहसास होता है.

हाल में, अमेरिकी सरकार ने गुलाम नबी फई को भारत विरोधी अभियान चलाने के आरोप में गिरफ्तार किया था. उस पर कुछ चुने हुए जेहादियों को संरक्षण देने के लिए विदेशी पैसों के इस्तेमाल का आरोप भी लगा था. अफजल और कसाब जैसों पर प्यार और स्नेह लुटाने वाले तमाम लोग इसी श्रेणी में आते हैं. कुछ लोगों का तो असली चेहरा सामने आ गया है, जबकि तमाम अन्य लोग अब भी वही कर रहे हैं, जो उनके हिसाब से सबसे अच्छा है.

दिलचस्प बात यह है कि अफजल के समर्थन में चलाया जा रहा अभियान खुद में ही दुलर्भतम राजनीतिक अभियान है, जबकि 9/11 के बाद, आतंकवाद को खत्म करने के लिए दुनिया ने स्पष्ट प्रतिबद्धता दिखाई है. यूरोप और अमेरिका ने तो आतंकवाद बर्दाश्त नहीं करने के मामले में एक नई मिसाल कायम की है. फ्रांस और बेल्जियम सहित कई यूरोपीय देशों ने आंतरिक सुरक्षा में अड़चन मानते हुए बुरके पर प्रतिबंध लगा दिया है.

राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति चिंता ने उनमें से कई के बहु-संस्कृतिवाद को तहस-नहस तक कर डाला है, लेकिन भारतीय कहानी इससे बिल्कुल अलग है. जेहादी आतंकियों से प्रेम करते हैं और अलगाववादियों के साथ एकजुटता दिखाते हैं. अपनी राष्ट्रविरोधी गतिविधियों पर परदा डालने के लिए वे मानवाधिकार का सहारा लेते हैं. दुनिया में कहीं भी मानवाधिकारों का उस तरह इस्तेमाल नहीं होता, जैसा कि भारत में आतंकवादियों का पक्ष लेने के लिए किया जाता है. अफजल के समर्थन में चलाए जा रहे अभियान को वे मानवाधिकारों का नया प्रतिमान मानते हैं. क्या मानवाधिकारों का इससे ज्यादा माखौल कुछ हो सकता है?

सुप्रीम कोर्ट की वकील नंदिता हक्सर ने 'कम्यूनलिज्म कॉम्बैट' (जून 2010) में लिखा था, और तीस्ता सीतलवाड़ व जावेद आनंद ने उसका संपादन किया था. 'कश्मीर के अलावा, बहुत से मुसलमान भी ऐसा महसूस करते हैं कि संसद पर हमले के दोषियों के समर्थन में चलाए जा रहे हमारे अभियान ने मानवाधिकारों का नया मानक तय किया है. हमारे देश को निगल रहे इस्लामोफोबिया के बीच उन्हें कुछ उम्मीद नजर आती है.'

यह अभियान इस मिथ्या प्रचार पर आधारित है कि निचली अदालत में अफजल के मामले में निष्पक्ष सुनवाई नहीं हुई. वे हाईकोर्ट में चले उसके मुकदमे और फिर सुप्रीमकोर्ट द्वारा उस पर मुहर लगाने को लेकर कोई बात नहीं करते. तो क्या इसका यह मतलब है कि भारतीय न्यायिक व्यवस्था पक्षपातपूर्ण है? क्या वे यह स्थापित करना चाहते हैं कि निचली अदालतों की 'बेइमानी' को सही करने में ऊपरी अदालतें अक्षम हैं.

चार साल तक चले मुकदमे के दौरान जेहादियों ने न्याय प्रणाली को प्रभावित करने की हर संभव कोशिश की. वे अदालतों को प्रभावित करने में नाकाम रहे. हालांकि वे एक षडयंत्रकारी और राष्ट्रविरोधी व्यक्ति को कश्मीरियत की जीती जागती मिसाल बनाने में कामयाब रहे. एक हद तक उन्होंने भारतीय मुसलमानों को 'सुरक्षा और भरोसा' भी दिया. इस तरह के घटनाक्रम देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा के लिए अनिष्टसूचक हैं.

हमारे समाज और राजनीति में इस तरह के मतिभ्रम के लिए यूपीए शासन ही जिम्मेदार है. वोट बैंक की राजनीति में सत्ताधारी पार्टी ने आंतरिक सुरक्षा को भी नजरअंदाज कर दिया है. अदालतें, जांच एजेंसियां और पुलिस-सभी इस रवैये के चलते निष्क्रिय हो गए हैं. यही वजह है कि आतंकवादी भारत को सुरक्षित पनागगाह मानते हैं.

भारत सरकार अनिर्णय की शर्म को छिपाने के लिए ढाल के रूप में लोकतंत्र का इस्तेमाल नहीं कर सकती. राष्ट्रपति के पास भेजी गई अफजल की क्षमा याचिका को खारिज कर देने की जरूरत है. जेहादियों ने अब यह कहना शुरू कर दिया है कि अगर अफजल को फांसी दी गई तो भारत की आंतरिक सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी और घाटी में जारी शांति के प्रयास भी बुरी तरह प्रभावित होंगे.

भारत-विरोधी प्रचार अतार्किक व सुनियोजित अफवाहों के जरिए देश और देशवासियों का मनोबल तोडऩे की कोशिश कर रहा है. अफजल की फांसी महज एक प्रतीक ही नहीं, बल्कि वह भारत सरकार की एक ठोस कार्रवाई होगी. अफजल मध्ययुगीन विचारधारा और मिशन का प्रतिनिधित्व करता है. अगर भारत उस पर जरा भी दया करता है तो विश्व समुदाय के सामने भारत की छवि एक डरपोक से ज्यादा कुछ नहीं होगी.

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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अंक तिथि: अगस्त 1, 2013

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