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शनिवार, नवंबर 1, 2014
 
 

'शीघ्रपतन, नामर्दी, स्वप्न दोष एवं शक्तिवर्द्धक औषधि'

 

राजु कुमार | दिसंबर 29, 2011 19:24
 

पिछले दिनों भोपाल में पहली बार अंतर्राष्ट्रीय वन मेला का आयोजन किया गया, इसके पूर्व 2001 से इसका आयोजन राष्ट्रीय मेले के रूप में होता आया है. वन मेला का आयोजन बहुत ही महत्वपूर्ण है. इसमें हर्बल उत्पाद, आयुर्वेदिक दवाइयां, जड़ी-बूटी, वनोपज एवं लकड़ी और वनोत्पाद से बनी वस्तुओं का एक बड़ा बाजार मुहैया कराया जाता है. पर इसके साथ-साथ आयुर्वेद एवं पारंपरिक चिकित्सा पद्धति से इलाज के लिए वैद्यों को भी स्थान मुहैया कराया जाता है. लगभग सौ से ज्यादा वैद्य एवं पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान वाले लोग इस मेले में नि-षुल्क नाड़ी परीक्षण कर रोगों की पहचान करते हैं और उसके आधार पर स्वयं द्वारा बनाई गई दवाइयों का सेवन करने के लिए उसकी बिक्री करते हैं.

चूंकि आयुर्वेद पद्धति से इलाज में मेरा विश्वास है, इसलिए मैंने इस साल विचार किया कि कुछ वैद्यों से मिला जाए और देखा जाए, कि वे इस मेले में किस तरह से इलाज कर रहे हैं.

मैंने शुरुआत कुछ इस तरह से की कि पहले कई सारे स्टॉल पर जाकर उनके पम्फलेट को एकत्र किया और उसके बाद उन्हें पढ़ना शुरू किया. फिर कुछ वैद्यों के पास जाकर उनका अवलोकन किया. अधिकांश वैद्य बुजुर्गों को दर्द की बीमारी होना बता रहे थे और युवाओं में शीघ्रपतन, नामर्दी एवं स्वप्न दोष की बीमारी की पहचान कर रहे थे. अजीब स्थिति थी, मुझे लगा कि क्या सारे भोपाल के युवा इसी बीमारी से पीड़ित हैं.

मैंने तय किया कि कुछ वैद्यों को मैं भी दिखाऊं. एक वैद्य के पास गया. उसने मुझसे पूछा कि क्या बीमारी है. मैंने कहा कि थोड़ी सर्दी-जुकाम जैसा लग रहा है. उसने कुछ देर तक नब्ज देखने के बाद कहा कि इसके साथ-साथ आपको कमजोरी भी है. आप शक्तिवर्द्धक चूर्ण ले लीजिए, तीन महीने बाद आपकी कमजोरी ठीक हो जाएगी. मैं अगले वैद्य के पास गया. वहां एक युवा अपनी कमजोरी ( शीघ्रपतन, नामर्दी एवं स्वप्न दोष) दूर करने के लिए 15 दिन की खुराक 1500 रुपए में बनवा रहा था.

बाबाजी का एक चेला चिलम तैयार कर रहा था. शायद युवा दिख रहे बाबाजी ने उस दवा का सेवन किया होगा, तभी चिलम के बावजूद उनपर कमजोरी हावी नहीं थी. खैर, उन्होंने मेरा नब्ज पकड़ने के बाद पूछा कि रात को अच्छी नींद आती है? मैंने कहा कि नींद तो आ ही जाती है. पर वे बोले कि अच्छी नींद नहीं आने के पीछे कमजोरी बड़ा कारण है. यदि थोड़ी भी दिक्कत हो, तो शक्तिवर्द्धक चूर्ण ले लेना चाहिए. मैं आगे बढ़ा. एक जगह असली शिलाजीत के साथ बाबा बैठे थे. वे कह रहे थे कि यह सारी बीमारियों को दूर कर देता है एवं स्टेमिना बढ़ाता है. एक युवा वहां कड़कड़ाती ठंड में खड़ा होकर कह रहा था कि वह दो दिन ही इस असली  शिलाजीत का सेवन किया और इतनी गर्मी आई कि वह टी शर्ट में भी ठंड महसूस नहीं करता. दो-चार जगह कुछ अधेड़ लोगों को भी शक्तिवर्द्धक चूर्ण लेते हुए देखा. सामान्य तौर पर कुछ महंगे चूर्ण, पर खरीददारों की कमी नहीं.

शक्तिवर्द्धक चूर्ण के चक्कर में मैं उलझ सा गया. एक वैद्य से मैंने पूछा कि क्या भोपाल के सारे युवाओं को कमजोरी की बीमारी है. उसने कहा कि यहां का पानी ही ऐसा है कि लोग कमजोर हो जाते हैं. अजीब बेवकूफी भरे जवाब मिल रहे थे और ऐसे ही इलाज भी. पर्चों पर बड़े-बड़े अक्षरों में पुरुष एवं महिला दोनों की कमजोरी दूर करने की दवाइयां एवं इलाज के दावों पर जोर देखकर अफसोस होने लगा एवं महसूस हुआ कि आखिरकार लोग एक बेहतर ज्ञान एवं चिकित्सा के क्षेत्र को क्यों पिछड़ा हुआ मानते आ रहे हैं. सभी वैद्य अपनी ढपली अपना राग के साथ बिना व्यस्थित ज्ञान के अभाव में कुछ भी करते जा रहे हों, तो आयुर्वेद का भविष्य ही खतरे में पड़ जाएगा.

यह सही है कि आदिवासी क्षेत्रों में पारंपरिक ज्ञान वाले चिकित्सक भी बेहतर इलाज करते होंगे, पर क्या सरकार की यह जिम्मेदारी नहीं है कि उन्हें उनके हाल पर छोड़ने के बजाय कुछ मानकीकरण की व्यवस्था करें. आयुर्वेद की पढ़ाई किए हुए डॉक्टर इस मेले में भाग नहीं लेते. पर जब वे आधुनिक ज्ञान एवं तकनीक के साथ आयुर्वेद का इलाज करते हैं, तो उन पर विश्वास गहरा होता है. निःसंदेह यदि हमें आयुर्वेद को सर्वस्वीकार्य बनाना है, तो उस पर व्यापक काम करने की जरूरत है. अन्यथा अल्पज्ञानी वैद्य लोगों को शीघ्रपतन, नामर्दी एवं स्वप्न दोष का बीमार बना देंगे या फिर आयुर्वद को  शीघ्रपतन, नामर्दी एवं स्वप्न दोष के इलाज वाली चिकित्सा पद्धति बना देंगे.

(यह लेखक के निजी विचार हैं, इसका द संडे इंडियन की संपादकीय नीति से कोई लेना-देना नहीं है)

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अंक तिथि: अगस्त 1, 2013

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