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बुधवार, अक्टूबर 22, 2014
 
 

मम्मी कहती हैं बड़ा नाम करेगा..

 

रजनीश शर्मा | शिमला , अक्टूबर 28, 2011 16:29
 

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किसी सरकारी कॉलेज का प्राध्यापक अगर आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक के सिद्धांत में खामी निकाले तो भला उस पर कौन ध्यान देगा?

अल्बर्ट आइंस्टीन...विज्ञान जगत में इस नाम को चुनौती देने वाले को एकबारगी तो कोई भी गंभीरता से नहीं लेगा. वह भी अगर वह भारत के एक छोटे से राज्य में सरकारी कॉलेज का प्राध्यापक मात्र हो तो फिर उसकी बात कौन सुनेगा? हिमाचल के भौतिक विज्ञानी अजय शर्मा ने जब आवाज उठाई तो अपने प्रदेश, अपने देश और फिर दुनिया ने उन्हें हतोत्साहित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन वह अपने विश्वास पर अडिग हैं कि आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत और समीकरण में शोध व संशोधन की गुंजाइश है.

अगर कोई भौतिक विज्ञानी तीन दशक से तर्कों सहित आइंस्टीन को गलत ठहराने का दावा कर रहा है तो उसके शोध पर खुली चर्चा में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, खासकर विज्ञान जगत को तो कतई नहीं, जो हर संभावना को खारिज करने से पहले उसके सभी पहलुओं की खोज खबर लेने में विश्वास रखता है. हो सकता है अजय गलत हों पर इसका फैसला तभी हो सकेगा, जब तर्कों का विशद, सांगोपांग वैज्ञानिक विवेचन होगा. विश्व विज्ञान बिरादरी उनकी बात सुन तो रही है, लेकिन उनके शोध पर खुली चर्चा से वह न जाने क्यों कतराती है. हिमाचल में हमीरपुर जिले के गांव चकमोह में जन्मे अजय की अनपढ़ मां ने उनके बालमन में कुछ असाधारण कर गुजरने की बात बिठा दी और अंतर्मुखी अजय बचपन से ही पुस्तक प्रेमी हो गए.

अजय शर्मा का शोध आइंस्टीन द्वारा स्थापित सिद्धांत की सही चर्चा करता है. भौतिक विज्ञानियों को अजय के शोध को प्रयोगात्मक नजरिए से देखना चाहिए.

प्रोफेसर स्टीफन क्रोथर्ज, एसोसिएट एडिटर, जर्नल प्रोग्रेस इन फिजिक्स, अमेरिका


अजय के शोध कार्य को गंभीरता से सुनकर उस पर गहन चर्चा करने की जरूरत है. वैज्ञानिक समुदाय वैसे भी नए विचारों पर चर्चा के लिए आग्रही रहा है.

गणेश कुमार शर्मा, भौतिक विज्ञानी, परमाणु ऊर्जा विभाग, शिलांग

 

बीएससी की पढ़ाई के दौरान आर्थर बेसर की एक पुस्तक पढ़ते हुए उन्हें लगा कि आइंस्टीन, आर्किमिडीज और न्यूटन के कुछ सिद्धांतों में संशोधन की जरूरत है. प्राध्यापकों से बात की तो उन्होंने उनकी बात को हंसी में उड़ा दिया. अजय ने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना से फिजिक्स में एमएससी की डिग्री हासिल की. आइंस्टीन पर शोध करने की मंशा लेकर अजय प्राध्यापकों की हंसी के पात्र बने. कोई भी प्राध्यापक उन्हें शोध करवाने के लिए राजी नहीं हुआ. हर तरफ से मिलने वाली उपेक्षा ने उनका मनोबल डिगा दिया. इसी बीच, अजय किसी तरह अस्सी के दशक के नोबेल पुरस्कार विजेता पाकिस्तानी भौतिक विज्ञानी अब्दुस्सलाम के संपर्क में आए. पत्रों के जरिए अब्दुस्लाम ने अजय का उत्साहवर्धन किया. अजय बताते हैं कि वह उनके लिए भगवान बनकर आए. प्रोफेसर सलाम ने उन्हें मार्गदर्शन और फिजिक्स के जर्नल्स में शोध पत्र भेजने की सलाह दी.

इंपीरियल कॉलेज, लंदन में कार्यरत प्रोफेसर अब्दुस्सलाम तीन दिन तक लंदन व तीन दिन तक इटली में प्रवास करते. दुर्भाग्य से 1990 में लकवे के शिकार प्रोफेसर सलाम की असमय मौत हो गई. अजय के लिए यह बहुत बड़ा धक्का था. पीएचडी न कर पाने की वजह से शिमला जिले के दुर्गम इलाके रोहड़ू में सरकारी स्कूल में फिजिक्स के प्राध्यापक पद से ही उन्हें संतोष करना पड़ा, लेकिन वह फिर जुटे और शोध पत्र छपने की शुरुआत वर्ष 1996 में भारत से हुई. अगले तीन साल तक उनके 12 शोध पत्र विभिन्न जर्नल्स में छपे. मन को कुछ तसल्ली हुई, लेकिन अपने शोध पत्रों पर चर्चा के लिए अजय ने कई वैज्ञानिकों व संस्थाओं को पत्र लिखा, पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई.

वर्ष 2001 से अजय ने इंटरनेट के जरिए विदेशी वैज्ञानिकों से संपर्क साधना शुरू किया तो विदेशों से व्याख्यान के लिए निमंत्रण आने लगे. वर्ष 2005 में ब्रिटेन से यूनिवर्सिटी ऑफ वारविक व ऑक्सफोर्ड से व्याख्यान की पेशकश आई. वैज्ञानिकों से संपर्क स्थापित करने, व्याख्यानों के लिए संसाधन जुटाने में अजय का काफी पैसा खर्च हो जाता है. वेतन के अलावा कहीं से कोई आर्थिक मदद नहीं मिलती, ऐसे में पत्नी के जीपीएफ से एक लाख रुपये निकाल कर वह ब्रिटेन गए. अजय को शिकायत है कि उनका शोध कार्य केवल विज्ञान बिरादरी तक ही सीमित है. हालांकि, आधुनिक संचार माध्यमों के जरिए विदेश के कई प्रतिष्ठित जर्नलों में उनके शोध छपे. उनके शोध पत्र अमेरिका के जर्नल प्रोग्रेस इन फिजिक्स, कनाडा के फिजिक्स एसेज व पोलैंड के कांसेप्ट ऑफ फिजिक्स में प्रकाशित हो चुके हैं. उनकी शोध संबंधी तीन पुस्तकें अमेरिका व जर्मनी से छपी हैं.

आंइस्‍टीन का सिद्धांत और अजय की आपत्तियां

वह दर्जनों अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में शिरकत कर अपनी बात रख चुके हैं. जेनेवा में तीन साल से जारी प्रयोगों के दौरान हाल ही में पाया गया कि एक खास किस्म के न्यूट्रिनो नामक उर्जा कण की गति प्रकाश से तेज है. यदि यह स्थापित हो गया कि न्यूट्रिनो की गति प्रकाश की गति से तेज है, तो समूचे विज्ञान जगत में भूचाल आ जाएगा. आइंस्टीन का एक शताब्दी से भी पुराना सापेक्षतावाद का सिद्धांत गलत हो जाएगा. अजय का दावा है कि जेनेवा के नतीजे उनके शोध को बल प्रदान करते हैं. यदि न्यूट्रिनो की गति आगामी प्रयोगों में भी प्रकाश की गति से तेज पाई गई तो केवल उनका सुझाया गया समीकरण ही ऊर्जा व प्रकाश की सभी अवस्थाओं की सही व्याख्या कर सकता है.

अजय का दावा है कि उनका सारा काम पारदर्शी है जिसे उनकी वेब साइट www.ajayonline.us पर जा कर कोई भी देख सकता है. अजय चाहते हैं कि केंद्र सरकार उनके शोध को गंभीरता से ले. केंद्रीय विज्ञान व प्रौद्योगिकी विभाग ने उनके शोध पत्रों के मूल्यांकन के लिए कमेटी का गठन किया है. इस साल मार्च से उनके शोध का मूल्यांकन शुरू हो चुका है और अब रिपोर्ट आनी बाकी है.

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अंक तिथि: अगस्त 1, 2013

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