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बुधवार, जून 19, 2013
 

आवरण कथा

भारत में हिंदी की लेखिकाएं

दुनिया में हिंदी की श्रेष्ठ लेखिकाओं को जानने के बाद हमने राज्यवार हिंदी की सेवा में लगी श्रेष्ठ व समर्पित रचनाकारों का चयन किया. शुरुआत ज्ञान की धरती बिहार से करते हैं, जहां महिलाएं आज अपेक्षाकृत तेजी से सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रिया से जुड़ रही हैं.

 

साहित्य के लिए उर्वर रही है ये धरा

राजु कुमार

मध्यप्रदेश कला और संस्कृति के साथ साहित्य का भी एक बड़ा केंद्र बन गया है. देश की श्रेष्ठ 25 महिला रचनाकारों में से कम से कम चार तो यहीं से हैं, और कई अन्य उस सूची में शामिल होने की हकदार दावेदार भी.

 

21वीं सदी की 25 श्रेष्‍ठ हिंदी लेखिकाएं

लेखन के क्षेत्र में महिलाएं तेजी से आगे आई हैं, और आ रही हैं. लिख रही हैं. कलम तोड़कर लिख रही हैं. वर्जनाएं तोड़कर लिख रही हैं. लाज आउटडेटेड शब्द हो गया है, लजा नहीं लजवा रही हैं. लिख क्या ललकार रही हैं. लहका रही हैं. धू धू कर जल रही हैं, रूढि़वादी सोच. जल रहे हैं जंगली मानसिकता वाले घास. जल रही हैं स्त्रियों को घूरने वाली गंदी आंखें.

 

राज्‍यों में हिन्‍दी के माथे की बिंदी

राष्‍ट्रीय-अंतरराष्‍ट्रीय फलक पर अपनी लेखनी से धूम मचाने वाली लेखिकाओं से इतर ऐसी महिला रचनाकारों की भी बड़ी तादाद है जो किसी राज्‍य के सुदूर कस्‍बे या छोटे शहरों में रह कर हिंदी की अहर्निश सेवा में रत हैं. साहित्‍य ही नहीं अकादमिक और साहित्‍येत्तर विधाओं में उन्‍होंने अपनी कलम का लोहा मनवाया है.

 

सात समंदर पार, हिंदी की अलमबरदार

प्रवासी भारतीय महिलाओं में हिंदी लेखन के प्रति रुझान बढ़ रहा है. दुनिया के पचास से भी अधिक देशों में फैले दो करोड़ से अधिक प्रवासी भारतीय चाहे किसी देशी- विदेशी भाषा में काम करें, बात करें, व्यापार करें पर उनका दिल उनकी अपनी भाषा में ही धड़कता है. उनके हिंदी प्रेम का ही नतीजा है कि इन देशों में रह रही पचासों प्रवासी महिलाएं हिंदी की सेवा और हिंदी में लेखन कर भारत को गौरवान्वित कर रही हैं

 

दिल्‍ली में लहलहाती लेखिकाओं की फसल

एक भोजपुरी कहावत है-लइका के पढ़ावऽ, ना त शहर में बसावऽ. जो दिल्ली जैसे शहर में आ गया, वह तो ऐसे ही छा गया. महानगर दिल्ली महिला रचनाकारों को उपयुक्त मिजाज, माहौल, मंच और मौके भी मुहैया कराता है. इसीलिए यहां महिला लेखकों की फसल लहलहा रही है

 

उत्तर प्रदेश की श्रेष्ठ लेखिकाएं

मानव मन की कुशल पारखी रंजना जायसवाल का जन्म 1968 में पडऱौना (उत्तर प्रदेश) में हुआ था. शिक्षा-दीक्षा पडऱौना और गोरखपुर में हुई. हिंदी साहित्य की अध्येता रहीं रंजना जी को बचपन से ही कविता से लगाव था.

 

महिला लेखन यानी भूख की मारी चिडिय़ा

दयानंद पांडेय

अपनी लंबी यात्रा और बदलते दौर में महिला लेखन का स्वरूप कितना बदला है और यह 'तब' कैसा था और 'अब' कैसा है, इस पूरे बदलाव पर एक नजर

 

हिंदीतर राज्यों में महिला हिंदी लेखन

अमृता प्रीतम की रचनाएं अगर हिंदी में नहीं आ पातीं तो क्या वे समूचे देश में इतनी लोकप्रिय हो पातीं? इंदिरा रायसम गोस्वामी या मामोनी गोस्वामी को आज हिंदी में कौन जानता?

 

हरियाणा और पंजाब की लेखिकाएं

कहानियों, कविताओं के जरिए अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाली अंजु दुआ जैमिनी का जन्म 1969 में सोनीपत (हरियाणा) में हुआ था. हिंदी साहित्य में एमए अंजु की अब तक कुल 14 कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं.

 

प्रेम और पुरुष

 

मंथन

नियंत्रण रेखा

हमलोग जिस समाज में रहते हैं, सिनेमा हमेशा से उस समाज को प्रतिबिंबित करता रहा है. इसलिए अगर 50 के दशक की फिल्मों को देखें तो उनमें अगर स्वतंत्रता संग्राम का कथानक है तो 60 के दशक की अधिकांश फिल्में दास प्रथा, कालाबाजारी और भ्रष्टाचार से संघर्ष करती हुई दिखती हैं.

 

संपादकीय

अन्ना के लिए जरूरी है कि वह अपने आंदोलन को बल देने के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति ज्यादा लचीला और सम्मानजनक रुख दिखाएं

अरिंदम चौधरी,प्रधान संपादक

मैं तब इतना छोटा था कि सचमुच सारी बातें ठीक-ठीक याद नहीं हैं. लेकिन मैंने बहुत से लोगों से सुना है कि अन्ना हजारे की गिरफ्तारी के बाद आज जिस तरह से जनविरोध हो रहा है, वह ठीक वैसा ही है, जैसा 1970 के दशक की शुरुआत में जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए संपूर्ण क्रांति आंदोलन में दिखा था.

 

कॉलम

इस छटपटाहट में खोखलापन ज्यादा है

राजेंद्र यादव

बात शुरू करने के पहले यह बता देना चाहता हूं कि दलितों और महिलाओं का कोई इतिहास नहीं है. इतिहास उनका होता है, जो फैसले लेते हैं. ये दोनों वर्ग फैसलों का अनुसरण करते रहे हैं, इन्होंने कभी फैसले नहीं किए.

 

महिला लेखन को कमतर नहीं आंका जा सकता

अशोक बाजपेयी

हिंदी जगत में जब हम महिला लेखिकाओं की बात करते हैं, तो आम तौर पर इसे एक आरक्षित वर्ग द्वारा आरक्षित वर्ग के लिए किए गए लेखकीय क्षेत्र में खानापूर्ति भर करार देते हुए नकार दिया जाता है.

 

स्त्री की भी अपनी देह-दुनिया है

प्रो. दिविक रमेश

सवाल यह है कि आखिर पुरुष में वे कौन-से सुर्खाब के पर लगे हैं, जिनके कारण स्त्री वैसी हो, जैसा पुरुष चाहता है. यह चाहना भी सत्तात्मक या दंभपूर्ण है. नारी-विमर्श यहीं से शुरूहोता है.

 

लेखन में महिला-पुरुष का वर्गीकरण उचित नहीं

प्रभाकर श्रोत्रिय

लेखन में महिला, पुरुष या वर्ग विशेष के नाम पर वर्गीकरण उचित नहीं है. कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं है, जिसके लिए लेखन में पुरुष और महिला के बीच वर्गीकरण किया जाए. पूरे हिंदी जगत का सृजन संसार हाल के कुछ वर्षों में काफी गंभीर हुआ है और इसमें सभी तबकों का योगदान है.

 

स्त्री लेखन: समकालीन यथार्थ

डा कमल कुमार

यह समय बुद्धिवाद, तकनीकवाद, उपभोक्तावादी वैश्विक पूंजीवाद का समय है, जो जीवन की भौतिकतावादी व्याख्या करता है. सार्वभौमिक निरपेक्ष सत्य की अवधारणा को स्थापित करता है.

 

सात समंदर पार लेखिकाओं का विपुल संसार

सुधा ओम ढ़ींगरा

लेखिकाएं हिंदुस्तान की सरजमीं से हजारों कोस दूर विदेशों में भी साहित्य सेवा के जरिए हिंदी को समृद्घ और हिंदुस्तान को गौरवान्वित कर रही हैं. पूरी दुनिया में हिंदी की महिला साहित्यकारों की गतिविधियों पर केंद्रित रिपोर्ट.

 

कहां है नारी स्वतंत्रता!

गंगा प्रसाद विमल, वरिष्ठ साहित्यकार

लिंगगत भिन्नता को छोड़ दें तो स्त्री किसी भी तरह से पुरुष से भिन्न नहीं है. दोयम तो वह हरगिज नहीं है. फिर भी उसे पुरुषों जैसी आजादी नसीब नहीं हो पाई है.

 

महिला लेखन यानी भूख की मारी चिडिय़ा

दयानंद पांडेय

अपनी लंबी यात्रा और बदलते दौर में महिला लेखन का स्वरूप कितना बदला है और यह 'तब' कैसा था और 'अब' कैसा है, इस पूरे बदलाव पर एक नजर

 

आपने फरमाया

शठे शाठयम समाचरेत

द संडे इंडियन के संपादकीय 'क्या कभी हमने सोचा है कि क्यों मुंबई में हमले होते जा रहे हैं, जबकि अमेरिका दूसरा 9/11 नहीं हुआ?' सचमुच 12 मार्च 1993 से अब तक मायानगरी 14 बड़े हमले हुए जिसमें व्यापक जान-माल का नुकसान हुआ तो कारोबार (पर्यटन, विदेशी निवेश) भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है.

 

विशेष संपादकीय

महिला लेखन में आई क्रांति सुखद, लेकिन इसमें विविधता जरूरी

ओंकारेश्वर पांडेय

द संडे इंडियन का यह विशेष अंक आपके हाथों में सौंपते हुए हमें काफी खुशी हो रही है. यह कोई सामान्य अंक नहीं है. भारतीय हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में संभवत: अपने तरह की यह पहली ही कोशिश है. कई महीनों के अथक प्रयास के बाद इसका प्रकाशन संभव हो पाया है.

 




अंक तिथि: जनवरी 1, 1970

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फिल्मी सितारों के सामाजिक सरोकार!!
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