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शनिवार, नवंबर 22, 2014
 
 

भोजपुरी कहानी विशेषांक

 

Issue Dated: सितंबर 4, 2011
 

द संडे इंडियन छपले बा भोजपुरी के 20 गो कहानी. एकरा में रउरा पढी जानल मानल कहानीकार शिवपूजन सहाय, गिरिजाशंकर राय, रमाशंकर श्रीवास्तव, भगवती प्रसाद द्विवेदी, अशोक द्विवेदी, डॉ. आशारानी लाल अउर डॉ. विवेकी राय के अलावा कइगो लेखकन के कहानी. पढ़े खातिर कहानी के शीर्षक प क्लिक करीं.

 

 

1. 'करिया कोट'
डॉ. आशारानी लाल


'करिया कोट'ई संजोगे रहे कि ओह दिने दिदिया कचहरी के राहे केनियो जात रही, कि अचानके थथम गइली आ लगली सोंचे. आपन आंखि के ऊ कई बेर मलली तबो विश्वास ना पड़े, फेरू निगिचा जाके देखली त इत्मीनान भइल, कि सांचो ई बीने हई. ई बीना कब से करिया कोट पहिने लगली, ऊ ना सोच पवली. इनकर त जिनगिए बदल गइल बा. आगे पढ़ी...

 




2. छरमतिया

सतीश प्रसाद सिन्‍हा

छरमतियाबड़की-बड़की आंख. धनुख लेखा तनल-तनल भौं. सुग्गा नियन उठल नाक. करिया-करिया घुंघुरूआ केस. मजगर सेनुर से भरल मांग. लिलार प सेनुरे के बड़ लाल टीका. कद साधारण. रंग गाढ़ा सांवर. देह से स्वस्थ आ चिकन-चाकन. छरमतिया आपन मुसहर टोला के एगो देखनउक मेहरारू रहे. ओकरा के जे देखे, ऊ देखते रह जाव. बाकिर केहू के ओकरा पंजरा ठेके के हिम्मत ना जुटो.





3. बिआह

जौहर शफियाबादी

बिआहबिआह के नाम सुनते जहां मन गद गद हो जाला, उंहवे बिआह कटवा के नाम सुनते जिऊ जर जाला. बाकी बिआह आ बिआहकटवा दूनो एके सिक्का के दूगो पहलू हवे. कुछ लोग बिआहकटवा के बाउर आदमी समझेलें बाकिर कबो-कबो बिआह कटवन के चलते लइकी वालन के कल्यानो हो जाला. जहां जे दू चार बेर कवनो लइका के बिआह कटल कि ओह बबुआ के भाव कम भइल. जहां चार लाख के मांग होत होखे, जदि दू बेरा ऊ लइका प बिआहकटवा महापुरुष के कृपा हो जाय त पचासो साठ हजार प सौदा पट सकेला.



4. मछरी

रामेश्वर सिंह कश्यप

मछरीताल के पानी में गोड़ लटका के कुंती ढेर देर से बइठल रहे. गोड़ के अंगुरिन में पानी के लहर रेसम के डोरा लेखा अझुरा-अझुरा जात रहे आ सुपुली में रह-रह के कनकनी उठत रहे जे गुदगुदी बन के हाड़ में फइल जात रहे. कबहूं, झिंगवा मछरी एंड़ी भिरी आके कुलबुलाए लागत रही सन, त सऊंसे देह गनगना जात रहे.

 




5. कुंदन सिंह-केसर बाई

आचार्य शिवपूजन सहाय



उठत जवानी रहे दूनों के. ओह जवानी पर भी अइसन चिक्कन पानी रहे कि देखनिहार के आंखि बिछिलात चले. गांव के लोग कहे कि बरम्हा का दुआरे जब सुघराई बंटात रहे तब सबसे पहिले ईहे दूनों बेकती पहुंचले. सचमुच दूनों आप-आपके सुग्घर. बिआह का बेर मांड़ो में देखनिहार का धरनिहार लागल रहे. घर-परिवार में केहू ना रहे.

 



6. चुनरी
कृपा शंकर प्रसाद

अब त रंग में भंग परिये गइल रहे. दरोगा जी के जगि में अइसन असगुन! जतना लोग ओतना बाति. आधा मिनट के अन्दरे लोग पागल के लागल तडि़आवे. एगो पागल के पीछे अतना आलम ओकरा के पकड़े खातिर पगलाइल धउरत रहे. भइल ई रहे...





7.  दुलहा के माथे मउर सोभे
जनार्दन तिवारी

दुलहा के माथे मउर सोभेअब त रंग में भंग परिये गइल रहे. दरोगा जी के जगि में अइसन असगुन! जतना लोग ओतना बाति. आधा मिनट के अन्दरे लोग पागल के लागल तडि़आवे. एगो पागल के पीछे अतना आलम ओकरा के पकड़े खातिर पगलाइल धउरत रहे. भइल ई रहे -





8. मकसद...
शिव दयाल

मकसद...हमरा के फूलमती चाची से जरूरे मिले के कहल गइल रहे. सामुदायिक विकास से जुड़ल एगो काम खातिर हमरा ओह गांव जाए के रहे. हमरा साथे दू गो सहयोगियो रहलन. अचरज के बात ई रहे कि राष्ट्रीय राजमार्ग प हिचकोला खात आवत हमनी के गाड़ी कच्चा रास्ता प आराम से चलत रहे. डेढ़-दू कोस चलला के बाद ई रास्ता पगडंडी में बदल गइल त हमनी के गाड़ी छोड़े के पड़ल. एक फलांग आगे गांव रहे.





9. सुविधा के शहर में सांप

तैयब हुसैन पीड़ित
आज अखबार खोललीं त गिनती में बाघन के संख्या बढ़ गइल रहे. जान के जइसे जान आइल. केतना अजब लागत बा, काल्ह तक देखल गिद्धन के अलोपित हो गइल. कठफोड़वा के पेड़ के तना प सट के 'टिर्र-टिर्र' कइल, फेर देरी ले लमहर ठोढ़ से 'ठक्-ठक्क' करत ओके फोड़ल.

मीडिया में पर्यावरण प बड़ चिन्ता लउकेला.

 

10. बक्श ए बिलारि

डॉ. अशोक द्विवेदी

अब टिसुरी के घरे कवनो बात होखे आ चउधरी ग्यान सिंह से छिपल रहि जाव भला. ऊ का खाला, का पहिरेला, के गोंने जिएला-मूवेला चउधरी कुल जानेलन. ऊ अनेरिहे चउधरी थोरे भइल बाडऩ. कुछ चउधुराहट बा तबे नू. टिसुरिया त उनकर हरवाहे ठहरल. ओकर आ ओकरा बाल-बच्चा का एक-एक हरकत के गिनती उनका पास बा.

 

 

11. बाट जोहत
भगवती प्रसाद द्विवेदी

बाट जोहत...पति के परमेश्वर मानेवाली तीन गो भारतीय नारी के कहानी जे लोग के समूचा जिनगी आपन पति के बाट जोहत निक





12. सन्यास के नेवता

डॉ. रमाशंकर श्रीवास्तव

नेवता देखते मन चटक गइल. आहि दादा, हे भदवारी में ई बिआह के नेवता कहां से. गिरधारी भगत बहरा के नेवता जल्दी छूअस ना, दोसरे से पढ़वा लेस. अपने छूइहें त ओकरा पहिले हाथगोड़ धो के मुंह में कुछ डलिहें-मुंह मीठ करिहें तब भोले बाबा के नाम लेके नेवता के लिफाफा खोलिहें. अब त नेवता लेके आवे वाला हजाम ठाकुर लोग दुलुम हो गइल.

 



13. परदेस...
सलिल सुधाकर

ऊ बिल्डिंग से नीचे उतरल तब गार्र्डेन वाला कोना प लोग जमा रहे. ऊ आपन मोटरसाइकिल स्टार्ट करे लागल त कई लोग ओकरा के घूम के देखल. एगो अनजान डर ओकरा रीढ़ के हड्डी में रेंग गइल रहे. पता ना काहे आजकाल ऊ जब आपन ऑफिस से वापिस आवेला तब आ जब दफ्तर जाए खातिर बाहर निकलेला तब बिल्डिंग के आस-पास कुछ लोग के एके होके रहस्यमय ढंग से बतियावत देखेला. फेर मय दिन ऊ दफ्तर आ घर में तनाव से तडफ़ड़ात बेचैन रहेला.

 



14. अप्रिय हितैषी
अमरकांत

रामसुख लाल हमेसा नीमन सोचेलन अउर नीमन करेलन भी, बाकिर सब बात में उनकरा अपयसे काहें मिलेला? उनकर पत्नी गुस्सा के कहेली, ''रउआ चुपचाप घर में काहे ना बइठीं ना, सब जगह बेमतलब के लुप-लुप पहुंच जाइला आ ओइसने बातो करे लागीं ला. एकरा से राउर इज्जत दू कौड़ी के हो गईल बा अउर दूसरा लोग के नजर में हमहूं हल्का पड़ गईल बानी.''

 



15. धरम के नाम कठमउग

नारायण सिंह


उनका अपना नौनिहाल प भरोसा रहे. उनकर नजर आशा के ओह किरन प झुकि गइल. नौनिहाल जी उनका बगल में अपना बपसी के कुरता पकड़ले खाकी नेकर में चरखाना के कमीज आधा खोंसले आधा पताखा लेखा फहरवले, कड़ुआ तेल से सनाइल आपन कोंहड़ा लेखा मुंडी उठा के मेला के भीड़ में भुलाइल बाछा लेखा चावा प खड़ा होके पता ना केने तिकवत रहलन.

 




16. फेनुस
रामनाथ राजेश


ओह दिन गबुदना एक दम गेना लेखा उछलत आइल रहे. असहूं ऊ हमेशा बत्तीसी देखाइएके बोलेला. हम ओकरा के कब से जानतानी ठीक से नइखीं कह सकत. भंइसी के चरवाही में जब जाइब त देखब कि टोला भर के भंइस ऊ अकेलहीं हांकता. सांच कहीं त हमनी के चरवाही में गबुदना के रहते कवनो चिंता ना रहल.

 



17. नयकी दुल्हनिया
अमर सिंह भिक्षुक


ई कुल बतकही खदेरन के सुना दिहलस फुलझरिया. उनुकर कपार बथे लागल. खीस त एतना बरल कि मंगरी के ढठिया दिहीं, बाकिर दिन जे धरा गइल रहे. ई कइला से लोग-बाग का सोची. एहसे नीक बा कि ओकरा के बियाहे बिदाई क दिहीं. जवन होई देखल जाई. भावना आ विचार जब आपस में मिलेला तबे निश्चय के जनम होला. आ निश्चय क्रिया में बदलेला. खदेरन के निश्चय क्रिया में रूपांतरित होखे लागल, आ ऊ बियाह के तइयारी में जुट गइलन.
 

 

18. लइका
गंगा प्रसाद विमल

अटारी के कवनों तल्ला से एगो लइका अंगना के एकदम बीचे में आके गिरल रहे. जब ले लोगन के धेयान लइका के ओर जाइत, ओकरा मुंह से लोहू गिर के ऐने-ओने बटे लागल. गिरला के चोट से बेहोस लइका के कपार एक ओरे लुढ़ुक गइल.


 

 

19. झूरी काका...
गिरीजेश राय जी

गांव में खबर फइलल 'झूरी काका मू गइलन' जे सुने ऊ एक बेर ठक हो जाव. जइसे बिच्छी के जहर चढ़ेला ओही तरे ई खबर गांव में फइलत जाव. खबर सुनते झूरी काका के चेहरा नजर का सोझा खाड़ हो जाव. अध पाकल बार संवारल, रंग-कद-काठी नीमन, अधबंहिया बगल में जेब वाली सीयल गंजी, फेटामार के धोती पहिरले, कान्ह प मारकीन के गमछा जवन ओढ़े आ पहिरे दूनो के काम आवे

 



20. गुरूजन आंदोलन
डॉ. विवेकी राय

एगो सभा भइलि. हमहूं चोंहपलीं. मजा आ गइल. अइसन सभा ना देखलीं आ ना सुनलीं. संजोग से ऊ चारू जना जुटि गइल रहलन. ऊ लोग न त एक पार्टी के लोग हवे आ न त एक गांव के रहवइयां. बस, दोस्ती एही से बा कि चारू जना चुनाव में हारल हवन. अब ई लोग रचनात्मक काम करे निकलल बाडऩ. गुनि-मथि के ई सभा बटोरले बाडऩ. एह सभा के अइसन-तइसन मति बूझीं.

 

(पढ़ी बहस - भोजपुरी से काहें डेरात बिया हिंदी)

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बाउर बढ़िया    
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तारीख: अप्रैल 18, 0000

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